Friday, September 29, 2017

पोन ठेलवा

कहानी प्रस्तुत है ... शीर्षक है.... पोन ठेलवा
एक देश में एक नेता हैं। वो 2014 चुनाव में राष्ट्रीय लहर में भी बुरी तरह हार गए...
फिर भी बैक डोर से मंत्री बने... वित्त मंत्री के रूप में भयानक फैसले लेते रहे...

प्रोविडेंट फण्ड में, 
कभी उम्र की सीमा 
कभी ब्याज दर में छेड़छाड़

नेशनल पेंशन स्कीम में 
इतना दिमाग और रिस्ट्रिक्शन 
कि उसको डूबा ही समझिए
ये नही की पहले स्टॉक एक्सचेंज में,
बिभाग अनियमितता को दुरुस्त करें

नोटबन्दी में 
आम आदमी, गरीब, माध्यम वर्ग, 
व्यापारी, दुकानदार,  
वकील, डॉक्टर, प्राइवेट प्रैक्टिशनर
सबको पसीना पसीना 
तबाह कर दिए

जी एस टी में 
गाहक दुकानदार दोनो तबाह
कही से भी दाम में राहत नही
फल, फूल, सब्जी, 
चश्मा, रेस्टोरेंट, वस्त्र, उपकरण
सब जगह सबकुछ महंगा
जाहिर है मांग और खपत कम हो गयी
कुछ कंगाल हो गए
कुछ मितव्ययी
कहते हैं रिसेशन है
छुपाते है  कि रीज़न उनके 'रिफॉर्म्स' हैं
कुछ खरीदना गुनाह
व्यासाय व्यापार करना अपराध

प्राइवेसी में
नाक अड़ा दिए
सब चीज़ में आधार नंबर चाहिए
डेटा सुरक्षा का अता पता नही
पब्लिक का डेटा 
कोई भी हैकर निकाल सकता है।

डिजिटल करेंसी में
इतना जोर, 
ये नही कि पहले
पहले इंफ्रास्ट्रक्चर बनाये
सिक्योर करे
एंड्राइड फ़ोन से मैलवेयर से
भगवान भरोसे रक्षा है।

टैक्स लिमिट में 
राहत को दबा के रखे हैं 
2019 के लिए
नौकरी करना गुनाह हो गया।

पेट्रोलियम का राहत दबा के रखे है
ये नही कि जनता को राहत दे।

कहते हैं
70 साल में कुछ नही हुवा
70 साल का अव्यवस्था है।
क्या कर रहे थे ये इतना दिन?
70 साल जनता सरकार चुनती रही
कोई तानाशाह नही हुआ।
भारत प्रगतिशील रहा, 
पड़ोसी की तरह फेल्ड मुल्क नही बना।
घर घर मे मोबाइल, आई टी में उन्नति
एच ए एल, इसरो सब हुआ।
अभिव्यक्ति की आज़ादी रही
सद्भाव और प्रेम बना रहा।
फिर भी त्रुटि तो रही ही
इसलिए इस सरकार को जनादेश मिला।
इस जनादेश का सम्मान कीजिये।
पहले के 70 साल के जनादेश का भी सम्मान कीजिये।
चुनाव नही लड़े पहले वो?
2014 में  पैदा हुवे?
और अब क्या कर रहे हैं?
जनता एम पी नही चुना
तो बस लग गए पीछे?
70 साल का बहाना सुन सुन
पब्लिक का कान पक गया।
कितना  बहाना कीजियेगा और कब तक?

देश मे वही एक बुधियार समझदार
बाकी सब बुरबक बेवकूफ?

लोगो में हाहाकार क्यों
सोशल मीडिया पर इनको फटकार क्यों?
कुछ तो वजह है।

फिर भी न तो 
ये पद से हटने वाले हैं
न ही सुधरने वाले।

माननीय वित्त मंत्रीजी
पोन ठेलवा का आधुनिक उदहारण हैं।

माननीय प्रधानमंत्रीजी आपके नाम पे कब तक
इनको झेलना पड़ेगा?

त्राहिमाम!

समझिये
नही तो 2019, 
2004 जैसे इंडिया शाइनिंग न हो जाये!

शब्द कोष
पोन ठेलवा - वो व्यक्ति जिसे ऊपर चढ़ाने या आगे बढ़ाने के लिये हमेशा पुश करना पड़ता है। 

निवेदन:
यदि इस कथा को उनके कानों तक पहुंचाना चाहते हैं तो लाइक एवं शेयर अवश्य करें Facebook, Whatsapp, Twitter...।

डिस्क्लेमर:
इनकम टैक्स, सी बी आईं 
इत्यादि संस्था को पीछे न लगाएं
क्योंकि इस कथा के
सारे पात्र काल्पनिक है
कहानी भी काल्पनिक है
और कथाकार भी
;) 
अमिताभ झा
http://amitabh-jha.blogspot.in

Friday, August 11, 2017

असहजता


असहजता

वर्षों विदेश में रहने के बाद वापस लौटा।
पाया काफी कुछ बदल गया था।

बैंगलोर जैसे आधुनिक शहर में,
हर आई टी पार्क में
नमाज़ की जगह की व्यस्था थोड़ा अटपटा लगा।

अधिकांशतः मुस्लिम मर्द दाढ़ी बढ़ाये हुए, औरतें पर्दे में।
कुछ लोग पठानी पोशाक में।

दोपहर में हजूम नमाज के लिए बढ़ता हुआ, आफिस टाइम में।

कुछ ज़ाकिर नायक के फैन भी।
वो ज़ाकिर नायक जो यूट्यूब पर
हमारे आस्था की धज्जी उड़ाते दिखता रहता है।

अपने आस्था का सम्मान हो,
पर हमारे आस्था का न अपमान हो,
मैंने बस यही चाहा।

खैर, आफिस में अजीब लगता था।

काफी दिन तक असहज महसूस करता रहा।

जन्म से ब्राह्मण, धर्म से हिन्दू हूँ।
फिर भी प्रोफेशन और अध्यन में
धर्म को अलग रखा।
दोस्त बनाये, बिना धर्म पूछे।

हर धर्म के दोस्त हैं, आज भी।
सदा उनकी भावना का ख्याल रखता हूँ।

सलाम वालेकुम
वालेकुम अस्लाम
एल्हमदुल लिल्लाह
कहने में कभी असहजता नही हुई।
ये बचपन से देखा, बोला, सुना।

जो पहले नही देखा, न सुना, न अनुभव किया
वो देख असहज हो ही जाता हूं।

मांस के नाम पर हिंसा सुन भी असहजता होती है।

इंसान हूँ!

एक वक्त था,
जब इंज़माम उल हक को मैच से पहले
पूरी पाकिस्तान क्रिकेट टीम के साथ
मैदान में नमाज पढ़ता देख अजीब लगता था।
बोलता, अरे यार, मैच खेल, अच्छा खेल।
सजदा घर मे कर, मस्जिद में कर।

कभी सोचा नहीं था, ये सब इतनी करीब से देखना होगा।
अपने देश में, शहर में, आफिस में।
पर ये सच है।

आज के तनाव भरे जिंदगी में
सजदा, बल देती है।
मुझे भी तनाव होता है,
चंद मिनटों में,
बस आंख बंद कर
गहरी साँस लेते हुए
सजदा कर लेता हूँ।
नया बल मिल जाता है।

आफिस में, सजदे के लिए इतना प्रयत्न?
कार्यालय काल मे ये थोड़ा अटपटा लगता है।
बोलता नहीं हूँ, ये सोच कि लोग बुरा मान जाएंगे।

प्रोफेशनल जगह और कैरियर में
इस तरह की बाते पहले नही देखी थी।

अपने इस असहजता को कहा बताता?

मैं तो उप-राष्ट्रपति हूँ नही
न ही राजनीतिज्ञ।

चलो, ठीक है यार
सजदा ही है, गुनाह नहीं।

पर असहजता तो थी ही।

धीरे धीरे आदत हो गयी।

भारत बदल रहा है।

अब तो कोई मुस्लिम मित्र या कस्टमर आता है
तो मैं ही पूछ लेता हूँ, नमाज को जाएंगे क्या?
नमाजी मित्रों से मिलवा देता हूँ।

सब सुखी रहें, निरोग रहें,
मिल के रहें यही कामना करता हूँ

- अमिताभ

Saturday, April 22, 2017

पंखुड़ी

Shortlived Shahzad Wakeel, a young IITian turned Activist, inspiration for many of us.
A poem composed on his memories on his birthday.

Poem dedicated to all activists, social worker and reformers who make difference to million lives everyday

नही रहा फरिश्ता जो
कड़ोरो में एक था
पर दिल मे है आज भी
वो बड़ा ही नेक था

किसी के आंख का नूर
सब के दिल का नेग था
ये आम बात नही
वो बड़ा विशेष था

बुद्धि और साहस का
अद्भुत समावेश था
ज्ञान उसका गहना
सादगी उसका भेष था

विचारों में उसके
बड़ा ही तेज वेग था
बहुत हीं प्रभावित
उससे हरेक था

वो पंचतत्व में विलीन
किन्तु आज भी विराजमान
वो तुझमें मुझमें पंखुड़ी में
आज वो हर एक है

- अमिताभ झा

Saturday, April 15, 2017

सन्तोषम परमं सुखं

साईं इतना दीजिये जा में कुटुम्ब समाय
मैं भी भूखा न रहूँ  साधु ना भूखा जाए

ये बात यदि समझ में आ जाये
तो सन्सार के आधे रोग,
आधे दुख, आधे फसाद
तुरंत समाप्त हो जाये।

और और
ये भी  लेना है
वो भी लेना है

जिसका विज्ञापन देखा वो लेना है
जो पड़ोसी के घर देखा वो लेना है
जो सम्बंधी के घर देखा वो लेना है
जो देखा वो लेना है

इस फेर में
कुछ सेहत से जा रहे
कुछ पागल हो रहे
कुछ जान से जा रहे

मुट्ठी बाँधे आये हैं
हाथ पसारे जाना है

जीवन सरल है
लोभ असंतोष रूपी गरल का क्या काम?

पैदाइश पे ढाई किलो सही
परवरिश से साठ किलो सही
अब ख्वाहिश क्विंटल टनों का न सही न सहा जाए!

- अमिताभ रंजन झा

धर्म पत्नी

गृहस्थी अजीब धर्म है
गृहस्थ की धर्म पत्नी होती है
गृहस्थ का धर्म पत्नी को प्रसन्न रखना
पत्नी का धर्म पति को त्रस्त रखना

पति कुछ भी कर ले
पत्नी की नजर में नालायक

मजदूर
पत्नी को टेम्पू रिक्शा में घूमा
दो सौ की साड़ी दिला कर
सनीमा दिखा कर
खुश करने की कोशिश करता रहता है

प्रवासी मजदूर
पत्नी को गोआ, ताज, स्विट्ज़रलैंड
एसी ट्रैन टैक्सी, हवाई जहाज में घूमा कर
दो चार हजार की साड़ी दिला कर
फाइव स्टार में खाना खिला कर
खुश करने की कोशिश करता है

पर  पति  नालायक ही रहते हैं
और सदा रहेंगे
धर्म पत्नी की नजर में

पतियों के लिए अश्रुपूर्ण सहानुभति
परम पिता परमेश्वर  से याचना प्रार्थना
अगले जन्म मोहे पत्नी बनैयहो

-अमिताभ रंज झा

Saturday, January 14, 2017

व्यंग - राजनीतिज्ञ की दूध दुहने की प्रतियोगिता

राजनीतिज्ञ दुहने में माहिर होते है।
नहीं होते तो शीर्ष पर नहीं पहुंच पाते।

शायद इस तथ्य से प्रेरित होकर
आयोजकों ने
मंगल ग्रह पर एक बार
अखिल ब्रह्माण्ड के
जाने माने राजनीतिज्ञ द्वारा
दूध दूहने का प्रतियोगिता आयोजित किया

सब नेता को अपना परिचय देना था
और
उनका नाम कैसे पड़ा
ये बताना था
और फिर दूध दूहना था।

एक से एक धुरंधर आये,
परिचय, नाम का कारण बताये
और फिर दूध का झड़ी लगा दिये।
पाँच, दस, बीस, पच्चीस लीटर।

खुराक देबामा जी का नंबर आया।
खुराक ज्यादा था बचपन से ही।
चौबीस घंटे माँ का दूध पीते रहते थे जब बच्चे थे।
जब से बोलना सीखे
हरदम कहते खुराक देबा माँ।
सो नाम पड़ गया खुराक देबामा।
बड़े हो गए हैं,
शादी भी हो गयी है, दो बेटी भी है।
लेकिन दूध खुराक अभी भी वही है।
पहले कहते खुराक देबा माँ
अब कहते हैं खुराक देबा बुच्ची के माँ?
आने के साथ ही
जितनी भी महिला वहा उपस्थित थीं
सबको सबसे खूबसूरत कहते गये।
महिला लोग को बुरा नहीं लगा
लेकिन मीडिया को बर्दाश्त नहीं हुआ।
हंगामा मचा दिये।
देबामा जी माफ़ी मांग के आगे बढ़े।
ऐसे ही परेशां थे,
वाइट हाउस से निकलना था
सदा के लिए।
सोच रहे थे
हिलेरी कीर्तन का हाल
लाकी अडवाणी वाला हो गया
ये बुड्ढी प्रेजिडेंट इन वेटिंग
वो बुड्ढा पीएम इन वेटिंग
सदा के लिए।
खैर,
आये एकदम गंग्नम स्टाइल में,
लाये अपनी जर्सी गाय
आ धराधर दूह दिए चालीस लीटर।

फिर निरंतर गोदीजी आये।
बताया बचपन से
निरंतर गोदी में रहते थे
सो नाम पड़ा।
गोदी में अब भी कुछ लोग लेना चाहते हैं,
मीडिया, भ्रष्ट, स्वार्थी, लोग।
काला धन काला मन वाले लोग।
मित्रों और जनता को धन्यवाद दिया
प्रतियोगिता देखने उमड़े
अपार भीड़ को
नोटबंदी के समर्थन के लिए
ह्रदय से धन्यवाद दिया।
गोदी जी फिर पूरा मेहनत से
पंद्रह लीटर दूहे।
सेक्रेटरी से पूछे
इतना कम काहे हुआ?
काहे दिल्ली और बिहार चुनाव वाला हो गया?
सेक्रेटरी बोले
देसी गाय है
जर्सी गाय का खाल पहना के लाये हैं।
हाइप क्रिएट करना पड़ता है।
आप पंद्रह निकाल दिए,
दुसरा पांचो लीटर नहीं निकाल सकता था।
फिर सेक्रेटरी इशारा किये
भीड़ के तरफ़।
हर तरफ गोदी गोदी की गूँज।
जज पूछा कितना है?
गोदीजी इमानदारी से बोले
फ़िफ्टीन।
सेक्रेटरी सजग था,
देश की ईज़्ज़त का सवाल था। 
उनके कहने से पहले
तमाम मीडिया, समर्थक लोग
हल्ला मचा दिये,
फिफ्टी, फिफ्टी।
फिफ्टीन फिफ्टी बन गया।
बस स्कोरर उनको
देबामा जी से भी ऊपर डाल दिया।
भीड़ फिर से चिल्लाई
गोदी गोदी गोदी गोदी।
देबामा जी मन मसोस के रह गए
मन ही मन बोले
बेटा मालूम था
तू दुनिया को पीछे छोड़ देगा।
इसलिए तोहरा
कहियो हमरे इहा का वीसा नहीं दिए।
जनता पीएम बना दिया
तो मज़बूरी में देना पड़ा।

फिर नंबर आया रहल गन्दे का।
महीन स्वर में बोले
हम बच्चा में गन्दा रहे थे।
माँ कहती तू हरदम रहेलअ गन्दे।
सो नाम पड़ गया रहल गन्दे।
बोले अब भी
जब साफ़ कुरता
बर्दाश्त नहीं होता है,
देहात में जा के मिट्टी,
कचरा उठा लेते है।
तलब भी पूरा हो जाता है
आ वाहवाही भी मिल जाता है।
बीच बीच में लंबी छुट्टी ले
तन मन की सफाई के लिए
गायब हो जाते हैं।
लौटते ही गोदी जी औए उनमे
वाक् युद्ध शुरू हो जाता है।
फिर दोनों पार्टी में भी।
एक दूसरे को ऐसी ऐसी उपमा
ऐसी ऐसी गालिया, अपशब्द
दे दी जाती हैं
की स्लम में रहने वाले भी
शर्मा जाएँ।
मीडिया प्राइम टाइम में शुरू हो जाती है
लोग चैनल बदल बदल के परेशां।
खैर, राहलजी
अब भी विशेष ट्रेनिंग ले के लौटे थे।
ज्यादा ही जोश में थे।
धराधर तीस लीटर दुह दिए।
सेक्रेटरी बोलता रह गया
सर सर छोड़ दीजिये,
लोग को पता चल जायेगा
स्विट्ज़रलैंड का गाय है।
माँ माथा पकड़ के बैठी
बड़बड़ाने लगी
बोली मना किये थे,
कहे थे कम दूहो।
पर सेक्रेटरी भी शातिर थे।
इशारा किये,
भीड़ से समर्थक हल्ला करने लगे।
रहल रहल।
जज पूछा कितना?
वो बोले थर्टी।
भीड़ से गूँज आयी
थर्टीन थर्टीन।
थर्टी थर्टीन हो गया।
माँ को भी चैन आया।

फिर आया नंबर आकेलेस का।
बोले घर में जब भी बिजली काटता
नेताजी पप्पा कहते
आ के लेस डिबिया।
सो नाम पड़ गया।
दुहना शुरू करने वाले थे की
चाचा गाय को
साइकिल पर ले के
भाग गए।
आकेलेस पीछे पीछे भागे
तो चाचा अपने भाई के घर घुस गए
फिर मीडिया बुला के
भाई के हाथों
आकेलेस को बेदखल कर दिए।
आकेलेस मीडिया को बोले
चचा अपने मर्जी दोस्त से मिल
हमको औरंगजेब घोसित कर दिया।
चाचा बचपन में खिलौना छीनते थे
अब माइक छीन रहे हैं।
दुनिया उगते सूरज को पूजती है
नेताजी अस्त हो रहे हैं,
जाहिर है,
दल में सबका स्वार्थ सिद्धि
आकेलेस से ही हो सकता है।
सो दल वाले
आकेलेस के साथ हो लिए।
नेताजी को
मार्गदर्शक बना दिया गया।
न दल में समर्थन
न जन में समर्थन
फिर भी
नेताजी चाचाजी और मर्जी
ढिंट की तरह अड़े हुए।
हंसी के पात्र बने हुए।
आकेलेस अब भी
गाय और साइकिल
का इन्तजार कर रहे है।
जैसे ही दोनों मिला
दुहना शुरू कर देंगे।

फिर आये लेले प्रसाद।
बोले बचपन गरीबी में बिता।
प्रसाद खा गुजारा होता,
लोग प्रसाद देते
और कहते लेले प्रसाद,
सो नाम हो गया।
दुनिया का
सबसे दुधारू गाय ले के आये थे।
दुहने बैठे की
गाय लात मार दी।
लेले प्रसाद ऐसे ही डरे थे
कही दोनों तेज पुत्र
उनको भी
मार्गदर्शक न घोसित कर दे।
उपर से मैडम बोली
ऐ साहब
इ का हो गया।
प्रसादजी झन्ना के बोले
चुप्प, मुंह बंद।
इधर गय्या बोली
सब चारा खुद खा लेते हो
और दूध दुहने आ जाते हो।
लोग हंसने लगे
बड़ी जग हँसाई हुयी।

उसके बाद धोती कुरता पहने
बत्तीस कुमारजी का नंबर आया।
मुस्कुराए, बत्तीस दांत दिख गये।
बोले जादा नहीं बोलूंगा,
पेट से ही बत्तीस दांत है।
सो नाम पड़ गया।
इन्तजार करना पड़ा,
उनका गाय नहीं आया था।
सेक्रेटरी बोला
सर विरोधी लोग गाय भगा दिया है।
गोदी जी के दल से कुछ बोले
जरूर कसाईघर वाले का काम है।
दंगाई लोग का काम है दंगा करना।
कही बकरी के मांस खाते लोग को
पीट के अधमरा कर दिए,
कही मृत गाय को ठिकाने लगाने
वाले लोग का ठिकाना लगाने लगे।
बदले में कही योग सूर्यनमस्कार कर रहे
लोग की लगा दी गयी।
हर तरफ
हैवानों ने मासूम इंसानों की लगा दी
इंसानियत फिर से सहम गयी।
बत्तीसजी ने गोदी जी से कट्टी कर लिया
लेले प्रसाद जी अपने दोनों तेजों के साथ
बत्तीसजी से चिपक गए।
खैर
गोदीजी का सेक्रेटरी 
एक आयोजक को इशारा किये।
वो आयोजक जो दिया
बत्तीस जी उसी को दुहने लगे।
सुबह से शाम हो गया।
रात हो गया।
बेदम हो गए
लेकिन दुहते रहे।
जज उनका बाल्टी देखा
तो पता चला एक पौवा भी नहीं था।
जज हँसा,
इ हिह ही इ हिह ही
कटाक्ष से बोला
इतना देर में इतना ही?
फिर ऊपर देखा,
होश उड़ गये। इ त सांड था।
बत्तीसजी बोले
गोदीजी को ऊपर रहने दिजिये,
उनको राज्य भी
जेर्सी गाय जैसा ही मिला था।
हमरा किस्मत,
राज्य भी
मरना सन्न सांड जैसा ही मिला था।
हम तो बस भाग लेने आये हैं,
रैंक का मोह नहीं है।
लेल प्रसाद जी के दोनों तेज पुत्र
फुरफुसाये पप्पा, चचा
सांड से दूध?
बत्तीस जी बोले बुरबक,
इज्जत रखना था ना।
मेहनत कर रहे थे,
जो पसीना आ रहा था
उसको चुनौटी के चुना में
मिला के बाल्टिया में गिराते गये।
बत्तीस दांत निकाल
एक आँख दबा के इही ही ही कर दिए।
बोले
जज लोग एक हफ्ता का समय देता
तो गोदी को पीछे छोड़ देते।
सेक्रेटरी को आँख मारे
बोले
जनता सब देख रही है,
लेकिन वही जो हम दिखा रहें हैं।

फिर नंबर आया
गमथा दीदी का।
बोली जिंदगी में बहुत गम था
सो नाम पड़ गया।
गुसैल मिजाज थी,
एक बार तो गुस्सा में
टाटा को राज्य से ही
टाटा कर दिया।
दीदी के कुछ भाई लोग
कसाई बनने लगे,
व्यापारियों के लिए
चिट्ट फण्ड इन्वेस्टर के लिए।
अब भी गुस्से में थी,
धरना पे बैठ गईं।
बोली अब या तो
री-मोनिटाइजेसन होगा
या डी-मोदी-टाइजेसन।
तभी दूध दुहेंगी।

भीड़ में टोपी पहने
कुछ लोग हल्ला मचा रहे थे
हरमन केजड़ेबाल को
काहे नहीं बुलाये इ प्रतियोगिता में।
सब प्रतियोगी मुस्कराने लगे
मने मन सोच के
जो आयकर बिभाग में हो कर भी
दुहना नहीं सीख पाया
यहाँ कैसे गाय दूह पाता।
केजड़ेबाल स्टेडियके बाहर
झाड़ू ले के सफाई ही करने लगे
जब नहीं घुसने दिया लोग.
चुनाव का टाइम था
इलेक्शन कमिसन से शिकायत हो गयी
देश के सारे झाड़ू को छुपा दिया गया
तो फिर कमल, हाथी, साइकल
की भी शिकायत हो गयी।
उनको भी छुपा दिया गया।
फिर हाथ की भी शिकायत हो गयी।
तो सबको शोले का ठाकुर कुर्ता
पहनने की हिदायत दी गयी।
खैर,
केजड़ेबाल
उधर ही धरना पर बैठ गए
और एक गौ-लोकपाल बिल का स्वांग शुरू।
और बड़बड़ा रहे थे
हमरा देख के बचपने से
हर मनके जड़े बाल
एही लिए हमरा नाम हरमन केजड़ेबाल।

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अमिताभ रंजन झा