Monday, February 25, 2013

पटना के अजायल मॉडल

पटना के मंदिरी मोहल्ला में बचपन गुजरा। एक साहूजी थे। उनके बारे में सुना कि एक समय था, वो बिलकुल फक्कर थे। एक बड़े साहूजी के यहाँ काम करते थे। जब पटना में बाढ़ आया तो, राहत का सामान कुछ इधर कुछ उधर कर के कुछ पूंजी जमा कर ली। अपना छोटा दुकान खोल लिया, किराने का। एक गाय खरीद लिया, दूध भी बेचते पानी के साथ। जमीन का छोटा टुकड़ा भी ले लिया और छोटा घर बना लिया एस्बेस्टस का। थोड़ा पूंजी और जमा हुआ, एस्बेस्टस निकलवा के पक्का घर। फिर एस्बेस्टस से फर्स्ट फ्लोर पर एक कमरे का घर। उसको किराये पर दे दिया। किरायेदार को दूध और किराना का भी सामान बेचते, उधारी में। कुछ समय बाद किरायेदार की शादी तय हो गयी। बोला एक कमरे में गुजर न होगा। साहूजी एस्बेस्टस का एक और कमरा बनवा दिए। फिर दो से चार कमरा हो गया कुछ समय में, दुसरे किरायेदार के लिए। फिर अपने उनका परिवार बड़ा होने लगा। तो ऊपर का एस्बेस्टस निकाल के पक्का बना दिए फर्स्ट फ्लोर को और सेकंड फ्लोर को एस्बेस्टस का बना दिए। लास्ट टाइम देखा था तो उनका घर चार फ्लोर पक्का था और पांचवा फ्लोर एस्बेस्टस का। दुकान भी बड़ा हो गया था और गाय की संख्या भी बढ़ गयी थी।

आज मैं सॉफ्टवेर आर्किटेक्ट हूँ। दस साल में कितने सारे प्रोजेक्ट की। सारे प्रोजेक्ट साहूजी के घर का मॉडल, एकदम अजायल!

और ये मॉडल पूरा पटना और पूरा इंडिया में मिलेगा।

ध्यान देने योग्य बात है कि साहूजी का घर साढ़े चार तल्ले तक खीच पाया क्योंकि नींव मजबूत होगा। सो प्रयास होना चाहिए कि नींव मजबूत हो।

- अमिताभ रंजन झा

I grew up at Mandiri area in Patna. There used to be a Sahuji. Sahuji is a word used for person belonging to business community. There was a time when he was pennyless. He used to work at a rich Sahuji's shop. Then came the big flood in Patna during seventies. He could manage to earn some capital by doing monkey business with flood relief packages. In short, as soon as the relief bags were dropped he could grab them and then hide them. Later he used to sell and earn money.

With the money he could open a small grocery shop. Also he bought a piece of land and constructed a small house with Asbestos roof. Slowly his capital grew. He removed the Asbestos and moulded his house roof with concrete. And he constructed one room house with asbestos on first floor and given it for rent. Also he offered grocery to the renter and others on monthly credit. After sometime, the renter got engaged with a girl. He said, one room is insufficient. So Sahuji constructed one more room for him. Later he constructed more rooms and gave for rent too. Time came when his family also became bigger. He made the second floor concrete and moved asbestos to third floor. Last time when I saw, his house was having four concrete floors and an asbestos flat on top.

Today, I am a software Architect. In last decade, I have delivered many projects. Interestingly all the projects I have done followed the Sahuji's house model, pure Agile!

You will find this model in whole Patna and in every corner of India.

Agile Patna, Agile India!

One thing need to be noticed that Sahuji's house could be extended to four and half storeys because the foundation was strong.

Moral: Work on basics and make the foundation strong!

Wiki - Agile:
Agile software development is a group of software development methods based on iterative and incremental development, where requirements and solutions evolve through collaboration between self-organizing, cross-functional teams. It promotes adaptive planning, evolutionary development and delivery, a time-boxed iterative approach, and encourages rapid and flexible response to change. It is a conceptual framework that promotes foreseen interactions throughout the development cycle. The Agile Manifesto[1] introduced the term in 2001.

Sunday, February 17, 2013

Photography Cheet Sheet



This is photography cheet sheet I created from my experience in past three years with Cannon EOS 550D.

You can start with this guideline. This may not work exact sometimes. As the photo is darker/brighter, accordingly try increasing/decreasing Shutter (Tv), Aperture (Av) values till you get the sweet spot.


Happy photography!




Monday, February 4, 2013

बेडिंग



जमाना सचमुच बदल गया है।

किसी को याद है बेडिंग और बेडिंग कसने की? चलिए चलते हैं कुछ दशक पहले।

अब हम सफ़र के वक़्त बेडिंग ले के नहीं चलतेहैं। पिछली बार आप कब चले थे बेडिंग ले के?

मैं अंतिम बार लाया था 1998 में जब पटना से बैंगलोर आ रहा था, पहली बार यूपी बिहार से बाहर निकला था वो भी 3000 किलोमीटर दूर। एक हफ्ते में घर याद आने लगा था। याद है, एक दिन बाबूजी से फ़ोन पर बात करते करते फ़ोन बूथ में ही रो पड़ा था। एक ही रट, नहीं रहना है यहाँ, मुझे वापस आना है। बाबूजी की आवाज भी भर्रा गयी थी, पर समझाते रहे बेटा पटना में कुछ खास फ्यूचर नहीं होगा तुम्हारा। पंद्रह साल हो गए, साबित हो गया, बाबूजी सही थे। बैंगलोर ने बहुत कुछ दिया है। एक कविता से आभार प्रकट करने की कोशिश की - "सपनो का शहर बैंगलोर "।

खैर बेडिंग पर वापिस आते हैं।

याद है, उन दिनों जहा भी जाना होता, बेडिंग ले जाना तय था।

आज कल के पीढ़ी को शायद पता न हो सो थोड़ी विवरण की कोशिश करता हूँ।

बेडिंग बोरिया बिस्तर ढोने का सामान। कही जाये तो सोने की परेशानी नहीं। बेडिंग मोटे कपड़े का होता था। छे सात फुट लम्बा और तीन चार फुट चौड़ा। गहरे कलर का। विपरीत छोरों पर डेढ़ दो फुट का खोल होता। इसमें तोशक के लम्बाई के विपरीत छोड़ घुसाए जाते। फिर दो बेल्ट होते सात आठ फुट लम्बे, बंधने के लिए। और एक कपड़े का ही हैंडल होता, पकड़ के उठाने के लिए।

यात्रा से पहले बेडिंग खोजा जाता। फिर अखबार जमीन पर बीछा कर उसको ऊपर रखा जाता। सबसे नीचे सतरंजी। फिर तोशक। ठीक से मोड़ के। तोशक बेडिंग से चौड़ा होता था। तो उसको हुनर से मोड़ना होता था। जाड़ा हो तो रजाई। फिर बिछाने का चादर, ओढ़ने का सिल्केन चादर। अब बारी तकियों की। उन्हें बेडिंग के लम्बाई के दोनों विपरीत छोरो पर के खोल में घुसाया जाता। फिर अखबार में लपेट कर हवाई चप्पल। पूरा ठस्सम ठस्स।

अब उसको बांधना।

तरीके से दोनों विपरीत छोरों को मोड़ा जाता। फिर एक छोड़ अन्दर और दूसरा उसके ऊपर। फिर बेडिंग बेल्ट कसना। एडजस्ट करना। उसके ऊपर बैठ के, कोहनी से, घुटना से किसी तरह दबाना की साइज़ कम जाये। फिर बेल्ट को इस तरह फसाना की यात्रा में बेल्ट पकड़ के उठाने वक़्त खुल न जाये।

बेडिंग कसना कला है कला। सबके बस की बात नहीं। बल भी चाहिए और बुद्धि भी।

छोटा था तो बगल के चाचा लोग मदद करते। बड़ा हुआ तो भय्या लोगो को बुलाता। जाता बुलाने। जा रहे हैं बाहर। बेडिंग कसना है। वो तुरत राजी। बल प्रदर्शन का मौका कौन छोड़ता है। और अच्छा पडोसी का फर्ज भी निभ जाता। वापस लौटने पर उनके लिए देहाती पेंडा, लड्डू, खाजा, अमरुद कुछ भी सौगात ले आते। अगली बार भी तो बेडिंग बंधवाना होता था।

फिर हम खुद बड़े हो गए। बेडिंग कसने के कला में धुरंधर। अब तो वो कला गया, कब के भूले। पर शायद बेडिंग कसना भी तैराकी की तरह है। आप कभी नहीं भूलते। लगता है भूल गए, पर भूलते नहीं।। वो कला अब लुप्त्प्रै है। शायद।

हमारे बच्चे कभी ये अनुभव कर सकेंगे?

घर का बना पेंडा, भैंस का दूध। खेत का गन्ना, हरा चना, कच्चा मूंग खेत में तोड़ छील कर खाना। आग में पकाया अल्हुआ, मकई ओरहा। और भी बहुत कुछ शुद्ध, प्राकृतिक और देहाती! शायद समय आएगा, हमारे बच्चे टूरिस्ट बनके अपने ही गांव जायेंगे और ये अनुभव प्राप्त करने की कोशिश करेंगे।

आइये बेडिंग को हार्दिक श्रधांजलि मिल के देते हैं! दो मिनट का मौन आँख बंद कर के।