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Friday, September 29, 2017

पोन ठेलवा

कहानी प्रस्तुत है ... शीर्षक है.... पोन ठेलवा
एक देश में एक नेता हैं। वो 2014 चुनाव में राष्ट्रीय लहर में भी बुरी तरह हार गए...
फिर भी बैक डोर से मंत्री बने... वित्त मंत्री के रूप में भयानक फैसले लेते रहे...

प्रोविडेंट फण्ड में, 
कभी उम्र की सीमा 
कभी ब्याज दर में छेड़छाड़

नेशनल पेंशन स्कीम में 
इतना दिमाग और रिस्ट्रिक्शन 
कि उसको डूबा ही समझिए
ये नही की पहले स्टॉक एक्सचेंज में,
बिभाग अनियमितता को दुरुस्त करें

नोटबन्दी में 
आम आदमी, गरीब, माध्यम वर्ग, 
व्यापारी, दुकानदार,  
वकील, डॉक्टर, प्राइवेट प्रैक्टिशनर
सबको पसीना पसीना 
तबाह कर दिए

जी एस टी में 
गाहक दुकानदार दोनो तबाह
कही से भी दाम में राहत नही
फल, फूल, सब्जी, 
चश्मा, रेस्टोरेंट, वस्त्र, उपकरण
सब जगह सबकुछ महंगा
जाहिर है मांग और खपत कम हो गयी
कुछ कंगाल हो गए
कुछ मितव्ययी
कहते हैं रिसेशन है
छुपाते है  कि रीज़न उनके 'रिफॉर्म्स' हैं
कुछ खरीदना गुनाह
व्यासाय व्यापार करना अपराध

प्राइवेसी में
नाक अड़ा दिए
सब चीज़ में आधार नंबर चाहिए
डेटा सुरक्षा का अता पता नही
पब्लिक का डेटा 
कोई भी हैकर निकाल सकता है।

डिजिटल करेंसी में
इतना जोर, 
ये नही कि पहले
पहले इंफ्रास्ट्रक्चर बनाये
सिक्योर करे
एंड्राइड फ़ोन से मैलवेयर से
भगवान भरोसे रक्षा है।

टैक्स लिमिट में 
राहत को दबा के रखे हैं 
2019 के लिए
नौकरी करना गुनाह हो गया।

पेट्रोलियम का राहत दबा के रखे है
ये नही कि जनता को राहत दे।

कहते हैं
70 साल में कुछ नही हुवा
70 साल का अव्यवस्था है।
क्या कर रहे थे ये इतना दिन?
70 साल जनता सरकार चुनती रही
कोई तानाशाह नही हुआ।
भारत प्रगतिशील रहा, 
पड़ोसी की तरह फेल्ड मुल्क नही बना।
घर घर मे मोबाइल, आई टी में उन्नति
एच ए एल, इसरो सब हुआ।
अभिव्यक्ति की आज़ादी रही
सद्भाव और प्रेम बना रहा।
फिर भी त्रुटि तो रही ही
इसलिए इस सरकार को जनादेश मिला।
इस जनादेश का सम्मान कीजिये।
पहले के 70 साल के जनादेश का भी सम्मान कीजिये।
चुनाव नही लड़े पहले वो?
2014 में  पैदा हुवे?
और अब क्या कर रहे हैं?
जनता एम पी नही चुना
तो बस लग गए पीछे?
70 साल का बहाना सुन सुन
पब्लिक का कान पक गया।
कितना  बहाना कीजियेगा और कब तक?

देश मे वही एक बुधियार समझदार
बाकी सब बुरबक बेवकूफ?

लोगो में हाहाकार क्यों
सोशल मीडिया पर इनको फटकार क्यों?
कुछ तो वजह है।

फिर भी न तो 
ये पद से हटने वाले हैं
न ही सुधरने वाले।

माननीय वित्त मंत्रीजी
पोन ठेलवा का आधुनिक उदहारण हैं।

माननीय प्रधानमंत्रीजी आपके नाम पे कब तक
इनको झेलना पड़ेगा?

त्राहिमाम!

समझिये
नही तो 2019, 
2004 जैसे इंडिया शाइनिंग न हो जाये!

शब्द कोष
पोन ठेलवा - वो व्यक्ति जिसे ऊपर चढ़ाने या आगे बढ़ाने के लिये हमेशा पुश करना पड़ता है। 

निवेदन:
यदि इस कथा को उनके कानों तक पहुंचाना चाहते हैं तो लाइक एवं शेयर अवश्य करें Facebook, Whatsapp, Twitter...।

डिस्क्लेमर:
इनकम टैक्स, सी बी आईं 
इत्यादि संस्था को पीछे न लगाएं
क्योंकि इस कथा के
सारे पात्र काल्पनिक है
कहानी भी काल्पनिक है
और कथाकार भी
;) 
अमिताभ झा
http://amitabh-jha.blogspot.in

Friday, August 11, 2017

असहजता


असहजता

वर्षों विदेश में रहने के बाद वापस लौटा।
पाया काफी कुछ बदल गया था।

बैंगलोर जैसे आधुनिक शहर में,
हर आई टी पार्क में
नमाज़ की जगह की व्यस्था थोड़ा अटपटा लगा।

अधिकांशतः मुस्लिम मर्द दाढ़ी बढ़ाये हुए, औरतें पर्दे में।
कुछ लोग पठानी पोशाक में।

दोपहर में हजूम नमाज के लिए बढ़ता हुआ, आफिस टाइम में।

कुछ ज़ाकिर नायक के फैन भी।
वो ज़ाकिर नायक जो यूट्यूब पर
हमारे आस्था की धज्जी उड़ाते दिखता रहता है।

अपने आस्था का सम्मान हो,
पर हमारे आस्था का न अपमान हो,
मैंने बस यही चाहा।

खैर, आफिस में अजीब लगता था।

काफी दिन तक असहज महसूस करता रहा।

जन्म से ब्राह्मण, धर्म से हिन्दू हूँ।
फिर भी प्रोफेशन और अध्यन में
धर्म को अलग रखा।
दोस्त बनाये, बिना धर्म पूछे।

हर धर्म के दोस्त हैं, आज भी।
सदा उनकी भावना का ख्याल रखता हूँ।

सलाम वालेकुम
वालेकुम अस्लाम
एल्हमदुल लिल्लाह
कहने में कभी असहजता नही हुई।
ये बचपन से देखा, बोला, सुना।

जो पहले नही देखा, न सुना, न अनुभव किया
वो देख असहज हो ही जाता हूं।

मांस के नाम पर हिंसा सुन भी असहजता होती है।

इंसान हूँ!

एक वक्त था,
जब इंज़माम उल हक को मैच से पहले
पूरी पाकिस्तान क्रिकेट टीम के साथ
मैदान में नमाज पढ़ता देख अजीब लगता था।
बोलता, अरे यार, मैच खेल, अच्छा खेल।
सजदा घर मे कर, मस्जिद में कर।

कभी सोचा नहीं था, ये सब इतनी करीब से देखना होगा।
अपने देश में, शहर में, आफिस में।
पर ये सच है।

आज के तनाव भरे जिंदगी में
सजदा, बल देती है।
मुझे भी तनाव होता है,
चंद मिनटों में,
बस आंख बंद कर
गहरी साँस लेते हुए
सजदा कर लेता हूँ।
नया बल मिल जाता है।

आफिस में, सजदे के लिए इतना प्रयत्न?
कार्यालय काल मे ये थोड़ा अटपटा लगता है।
बोलता नहीं हूँ, ये सोच कि लोग बुरा मान जाएंगे।

प्रोफेशनल जगह और कैरियर में
इस तरह की बाते पहले नही देखी थी।

अपने इस असहजता को कहा बताता?

मैं तो उप-राष्ट्रपति हूँ नही
न ही राजनीतिज्ञ।

चलो, ठीक है यार
सजदा ही है, गुनाह नहीं।

पर असहजता तो थी ही।

धीरे धीरे आदत हो गयी।

भारत बदल रहा है।

अब तो कोई मुस्लिम मित्र या कस्टमर आता है
तो मैं ही पूछ लेता हूँ, नमाज को जाएंगे क्या?
नमाजी मित्रों से मिलवा देता हूँ।

सब सुखी रहें, निरोग रहें,
मिल के रहें यही कामना करता हूँ

- अमिताभ

Monday, November 19, 2012

हरश्रृंगार - प्रकृति का अनुपम उपहार

हरश्रृंगार एक अदभुत फूल है, छोटा सा प्यारा सा! पटल का श्वेत रंग स्वच्छता का प्रतीक, नारंगी डंडी श्रींगार का और मनमोहक भीनी भीनी खुशबु ईश्वर का प्रतीक. हर घर का श्रृंगार, प्रकृति का अनुपम उपहार.

दशहरे के समय याद कर रहा था इस फूल को. इस फूल को पूजा में चढ़ाते थे. जमीन पर गिरा फूल अपवित्र होता है. इसलिए पेड़ के जड़ के पास के जमीन को गोबर से नीपा जाता था. नीपे हुए जमीन पर गिरा फूल अपित्र नहीं माना जाता. फिर सवेरे सवेरे फूल्डाली ले के निकल पड़ते थे फूल लाने. छोटा था तो प्रेम कुमार काकी, बाबा या दाई (दादी) की उंगली पकड़ कर. कुछ बड़ा हुवा तो अकेले ही. सूर्य के उगने से पहले की लालिमा जीवन में रंग भरते. हरे घास पर ओस की बुँदे पांव धो कर स्वागत करते तो घास की जड़ की गीली मिटटी बाटा हवाई चप्पल से आलिंगन और छोटी छोटी चिड़िया प्रभात वंदना. फिर फूल तोड़ता पहले हरश्रृंगार फिर कनैल फिर बेला, गेंदा, दूब, बेलपत्र इत्यादि. फिर सीना तान के लौटता था भरा हुवा फूल्डाली के साथ. बौकी अंगना नीप रही होती थी और उसके हाथ के बाल्टी में पवित्र गोबर का लेप खचाखच भरा हुआ. घर की महिलाये महादेव बना रहे होते और पुरुष दालान पर. बिन्देसर के द्वारा लाया गया नीम का दंतमन को कोलगेट मंजन के साथ रगड़ता. फिर माटी के चूल्हे के ऊपर लोहे की लोहिया में घंटो तक उबला हुआ भैंस का खांटी दूध, स्टील के बड़े से गिलास में, एक चौथाई छाली से भरा हुआ और शक्करयुक्त. बाबा के अंगोछा में गरम गिलास पकड़ के सुरक सुरुक के पीता दूध. फिर कभी कभी साथ में मोध से भरा रोटी का रोल. जैसे ही दाई तुलसी चौरा का परिक्रम पूरा करती और बाबा के बाम ब्रू ख़तम होता दौड़ता प्रसादी के लिए.

फूल तो फूल, पत्ते का भी कम महत्व नहीं है. कितनी बार मियांदी बुखार होता तो दो हफ्ते का देहाती इलाज. नरम पत्तों को मारीच के साथ पीस के पिलाया जाता. बहुत कड़वा पर काम कर जाता. फिर इस पेड़ में छोटे छोटे फल लगते हैं जो खाया नहीं जाता. पर फल को छील अन्दर के गोटी को निकाल कर उसको आँखों के पलक में लगा के काली माई बन जाते. क्या मस्ती भरा खेल था. कभी सोचता हूँ कि दोषी हूँ अपने बच्चों का.. पता नहीं वो ये अनुभव कर पाएंगे नहीं.

चलिए एक गहरी सांस लेते हैं. रविवार ख़तम, कल ऑफिस जाना है.




Tuesday, October 16, 2012

गांव

गांव के दिन याद आते हैं.
चाँद पंक्तियाँ उन यादों को समर्पित है.

गांव की हवेली का
हर राज पुराना है|
रौशन था जो आँगन
आज वीराना है||

मीठी सी यादे हैं
रोने का बहाना है|
छोड़ा हमने देस
रोटी जो कमाना है||

गांवों के बीते दिन
अब नया जमाना है|
अजनबी शहरों में
हर शख्श अनजाना है||

नेकी, सादगी, संतोष
बात बचकाना है|
दौलत, शोहरत, ताक़त
सफलता का पैमाना है||

रह जाये न पीछे
दौड़ लगाना है|
ठोकर खा के जो गिरे
संभल कर उठ जाना है||

सब दाव लगाकर
किस्मत आजमाना है|
हार नहीं सकते
मुंह जो दिखाना है||

खुद को भुलाना है
मुखौटा लगाना है|
यूँही मुस्कुरा कर
हर दर्द छुपाना है||

पर मन में एक लगन
घर वापस जाना है|
हाथों में ले मिटटी
माथे पे लगाना है||

दिन हफ्ते रुक कर
दिल को बहलाना है|
भारी मन फिर से
उसी शहर में आना है||

हवा, हरयाली, अपनापन
सपना रह जाना है|
शहरों के दरबे में
उम्र बीताना है||

- अमिताभ रंजन झा






Monday, September 24, 2012

पैसे पेड़ पे नहीं लगते हैं




रोटी, कपडा, पानी, बिजली, फ़ोन, मकान,
सेवक, रक्षक, गाड़ी, इलाज , यात्रा, विमान,
पद, ताक़त, दबदबा, विदेश यात्रा, रौब, सम्मान
सब जनता के द्वारा करदान से ही संभव होते हैं
किन्तु संतोष इतने से हो नहीं इसलिए घोटाले होते हैं
सच कहता है मोहन पैसे पेड़ पे नहीं लगते हैं


दूरसंचार, अनाज, बिजली, वस्त्र, फोरेक्स, वित्त, न्याय, मकान
पथ, बांध, दवा, दारू, कोयला, जमीन, खान, हर परियोजना
तेल, बाढ़, सेना, खेल, वायुपत्तन, स्टाम्प, शिक्षा, सुरक्षा, पेंसन
चुनाव, संसद, विधान परिषद्, पंचायत, हर तंत्र ,विभाग, और योजना
सर्वत्र नित्य नए भ्रष्टाचार के अनगिनत बीज उगते हैं
सच कहता है मोहन पैसे पेड़ पे नहीं लगते हैं

सच कहता है मोहन पैसे पेड़ पे नहीं लगते हैं
कहना था जो बेबाक तो तुने कह डाला मोहन
पर थोड़ा तो सोचता की लोग क्या क्या सहते हैं
जन्म से पूर्व और मृत्यु पश्चात भी तिल तिल मरते हैं
एक सवाल जनता भी पूछती है मोहन
हमारे पैसे क्या पेड़ पे लगते हैं?

- अमिताभ रंजन झा

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हमारे पैसे क्या पेड़ पे लगते हैं?
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2012
• Kinetic Finance Limited Scam - Banks lost about 200 crore (US$36.2 million). [17]. At present the matter is under the scanner of investigating / intelligence agencies of India.
• Ultra Mega Power Projects Scam - Central government lost 29,033 crore (US$5.25 billion) due to undue favours to Anil Ambani-led Reliance Power.[1][18]
• IGI airport Scam - Central government lost 166,972.35 crore (US$30.22 billion) by undue favours to GMR-led DIAL. DIAL (Delhi International Airport Limited) is a consortium of the GMR Group (50.1%), Fraport AG (10%), Malaysia Airports (10%), India Development Fund (3.9%), and the Airports Authority of India (26%).[19][20]
• Andhra Pradesh land scam - 100,000 crore (US$18.1 billion)[21]
• Forex derivates scam - 32,000 crore (US$5.79 billion)[22][23]
• Granite scam in Tamil Nadu - [24]
• Service Tax and Central Excise Duty fraud - 19,159 crore (US$3.47 billion) crore)[25][26]
• Gujarat PSU financial irregularities - 17,000 crore (US$3.08 billion)[27][28]
• Maharashtra stamp duty scam - 640 crore (US$115.84 million)[29][30]
• Maharashtra land scam[31][32][33][34][35][36][37]
• MHADA repair scam - 100 crore (US$18.1 million)[38]
• Highway scam - 70 crore (US$12.67 million) [39][40][41]
• Ministry of External Affairs gift scam[42][43][44]
• Himachal Pradesh pulse scam[45][46]
• Flying Club fraud - 190 crore (US$34.39 million)[47]
• Andhra Pradesh liquor scam[48][49]
• Jammu and Kashmir Cricket Association scam - Approximately 50 crore (US$9.05 million)[50][51]
• Jammu and Kashmir PHE scam[52]
• Jammu and Kashmir recruitment scam[53]
• Jammu and Kashmir examgate[54][55]
• Jammu and Kashmir dental scam[56]
• Punjab paddy scam - 18 crore (US$3.26 million)[57][58]
• NHPC cement scam[59]
• Haryana forest scam [60][61][62][63][64][65][66][67][68][69]
• Girivan (Pune) land scam [70] (not to be confused with Pune land scam which came to light during 2011)
• Toilet scam[71][72]
• Uttar Pradesh stamp duty scam - 1,200 crore (US$217.2 million)[73]
• Uttar Pradesh horticulture scam - 70 crore (US$12.67 million)[74]
• Uttar Pradesh palm tree plantation scam - 55 crore (US$9.96 million)[75][76][77]
• Uttar Pradesh seed scam - 50 crore (US$9.05 million)[78][79]
• Uttar Pradesh elephant statue scam[80][81][82][83][84]
• Patiala land scam - 250 crore (US$45.25 million)[85][86][87][88]
• Tax refund scam - 3 crore (US$543,000)[89][90]
• Bengaluru Mayor's fund scam[90]
• Ranchi real estate scam[91]
• Delhi surgical gloves procurement scam[92]
• Aadhar scam[93][94][95][96]
• BEML housing society scam[97][98][99]
• MSTC gold export scam - 464 crore (US$83.98 million)[100]
• TIN scam[101][102]
• Nayagaon (Punjab) land scam[103]

2011
• ISRO's S-band scam (also known as ISRO-Devas deal, the deal was later called off) - 200,000 crore (US$36.2 billion) [104][105][106][107]
• NTRO scam - 800 crore (US$144.8 million)[108][109][110][111]
• KG Basin Oil scam[112][113][114][115][116]
• Goa mining scam[117][118]
• Bellary mining scam
• Bruhat Bengaluru Mahanagara Palike scam - 3,207 crore (US$580.47 million)[119][120][121][122]
• Himachal Pradesh HIMUDA housing scam[123][124]
• Pune housing scam [125]
• Pune land scam [126][127]
• Orissa pulse scam - 700 crore (US$126.7 million)[128][129][130][131]
• Kerala investment scam - 1,000 crore (US$181 million)[132]
• Mumbai Sales Tax fraud - 1,000 crore (US$181 million)[133]
• Maharashtra education scam - 1,000 crore (US$181 million)[134][135]
• Maharashtra PDS scam[136][137]
• Uttar Pradesh TET scam[138][139][140]
• Uttar Pradesh MGNREGA scam[141]
• Orissa MGNREGA scam[142][143][144]
• Indian Air Force land scam[145][146][147]
• Tatra scam - 750 crore (US$135.75 million)[148]
• Bihar Solar lamp scam - 40 crore (US$7.24 million)[149][150]
• BL Kashyap - EPFO scam - 169 crore (US$30.59 million)[151][152]
• Assam Education scam[153]
• Stamp Paper scam (not to be confused with Abdul Karim Telgi's Stamp Paper scam) - 2.34 crore (US$423,540)[154]
• Pune ULC scam[155][156][157]

2010
• Adarsh Housing Society scam
• Assam North Cachar Hills scam - 1,000 crore (US$181 million)[158][159]
• Arunachal Pradesh PDS scam - 1,000 crore (US$181 million)[160][161][162]
• LIC housing loan scam
• Commonwealth Games scam
• Belekeri port scam
• Andhra Pradesh Emmar scam - 2,500 crore (US$452.5 million)[163][164][165][166]
• Madhya Pradesh MGNREGA scam - 9 crore (US$1.63 million)[167]
• Jharkhand MGNREGA scam[168][169][170]
• Indian Premier League scandal[171][172]
• Karnataka land scam [173][174][175]
• Karnataka housing board scam[176][177][178]
• Uttrakhand Citurgia land scam[179][180]
• MCI bribery scandal[181][182][183]
• Chandigarh booth scam[184]

2009
• Madhu Koda mining scam
• Goa Special Economic Zone (SEZ) scam[185][186]
• Rice export scam - 2,500 crore (US$452.5 million)[187]
• Orissa mining scam - 7,000 crore (US$1.27 billion)[187]
• Orissa paddy scam[188][189]
• Sukhna land scam - Darjeeling [190][191][192][193]
• Vasundhara Raje land scam[194]
• Austral Coke scam - 1,000 crore (US$181 million)[195][196]
• Gujarat's VDSGCU Sugarcane scam - 18.7 crore (US$3.38 million) [197][198][199]

2008
• Cash for Vote Scandal
• Hasan Ali black money controversy[200][201][202]
• The Satyam scam [203]
• State Bank of Saurashtra scam - 95 crore (US$17.2 million)[204][205]
• Army ration pilferage scam - 5,000 crore (US$905 million)[206]
• Jharkhand medical equipment scam - 130 crore (US$23.53 million)[207][187]
• Haryana Teachers' recruitment scam[208][209]
• Paazee Forex scam - 800 crore (US$144.8 million)[210][211]

2006
• Kerala ice cream parlour sex scandal
• Scorpene Deal scam[212][213][214]
• Punjab city centre project scam - 1,500 crore (US$271.5 million)[187]
• Uttar Pradesh ayurveda scam - 26 crore (US$4.71 million)[215][216][217][218]
• Navy War Room Spy Scandal (related to Scorpene Deal Scam)

2005
• Taj Co-operative Group Housing Scheme scam - 4,000 crore (US$724 million)[219][220]
• IPO scam [221][222]
• Oil for food scam [223]
• Bihar flood relief scam - 17 crore (US$3.08 million)[224]

2004
• Gegong Apang PDS scam

2003
• Taj corridor scandal
• HUDCO scam[225]

2002
• Stamp paper scam - 20,000 crore (US$3.62 billion)[226][227][228]
• Provident Fund (PF) scam [229][230]
• Kargil coffin scam[231]

2001
• Ketan Parekh securities scam
• Barak Missile scandal
• Calcutta Stock Exchange scam[232]

2000
• India-South Africa match fixing scandal[233]
• UTI scam - 32 crore (US$5.79 million)[187]

1997
• Cobbler scam [234][235]
• Hawala scandal
• Bihar land scam - 400 crore (US$72.4 million)[187]
• SNC lavalin power project scam - 374 crore (US$67.69 million)[187]
• Sheregar Scam [236]

1996
• Bihar fodder scam - 950 crore (US$171.95 million)[237][238][239]
• Sukh Ram telecom equipment scandal
• C R Bhansali scam - 1,100 crore (US$199.1 million)[240][241]
• Fertiliser import scam - 133 crore (US$24.07 million)[242][243]

1995
• Purulia arms drop case
• Meghalya forest scam - 300 crore (US$54.3 million)[206]
• Preferential allotment scam - 5,000 crore (US$905 million)[187]
• Yugoslav Dinar Scam - 400 crore (US$72.4 million)[187]

1994
• Sugar import scam [244][245]

1992
• Harshad Mehta securities scam - 5,000 crore (US$905 million)[246]
• Palmolein Oil Import Scam, Kerala
• Indian Bank scandal - 1,300 crore (US$235.3 million)[233]

1990
• Airbus scandal [223][233]

1989
• St Kitts forgery[233]

1987
• Bofors Scandal[246]

1981
• Cement Scam involving A R Antulay - 30 crore (US$5.43 million)[233]

Sunday, August 12, 2012

चुटकी भर ईमानदारी


समाचार देख रहा था टेलीविजन पर. उफ़ कितने सारे विज्ञापन आते हैं. वो जमाना गया जब समाचार या कार्यक्रम के बीच में विज्ञापन दिखाया जाता था. अब तो मानो जैसे विज्ञापन के बीच में कार्यक्रम दिखाया जाता है.

टाटा नमक का विज्ञापन देखा. कुछ इस तरह का सन्देश है "यदि हर माँ अपने बच्चे को चुटकी भर ईमानदारी रोज दे तो देश तो इमानदार बनेगा ही."

सोचने लगा.

टाटा नमक की कीमत सोलह रूपये से शुरू होती है. देश की साठ प्रतिशत आबादी गरीब है और वो ये नमक नहीं खरीद सकती. धन्यवाद सरकार को और मुद्रास्फीति को.

बीस प्रतिशत जनता राजनेता, सरकारी नौकरशाह, बाबू, दलाल, माफिया, बिचौलियों की जमात है और उसमे में अधिकांशतः बेईमानी की रोटी खाते हैं. वो लोग अपने बच्चो को टाटा नमक खिलाने की सोच भी नहीं सकते. कही संतान इमानदार निकल गया तो? दुनिया को, बिरादरी वाले को क्या मुंह दिखायेंगे? सोच के ही उनका कलेजा मुंह को आ जाता होगा. बेचारे. टाटा नमक को उनपे रहम क्यूँ नहीं आता?

अब बाकी की बीस प्रतिशत जनता के लिए नमक के दर्जनों विकल्प हैं. तो टाटा नमक के लिए कितना बाजार बचता है? उनके लिए सलाह. ये ईमानदारी वाला विज्ञापन जल्द से जल्द बंद कर दे. बाजार में हिस्सेदारी बढ़ जाएगी.

सबको स्वतंत्रता दिवस की अग्रिम शुभकामनाये!

आपको ये भी पसंद आये शायद!

स्वतंत्रता दिवस सन्देश 2011

स्वतंत्रता दिवस सन्देश 2010 जशन-ए-आज़ादी

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I was watching news on television. Oh my God! So many advertisements! Those days are gone when advertisements used to come between programs. Those days are gone when there use to be commercial breaks between programs. Now a days it is program breaks between commercials. Programs come between advertisements.

I saw Tata Salt's advertisement which is very frequent these days. The message goes something like this "If every mother serve their child a pinch of salt, country is bound to be honest."

I was lost in thoughts.

The price of Tata salt starts from Rupees sixteen. So sixty percent of the population is poor and cannot afford it. Thanks to the government and inflation.

Twenty percent include politicians, leaders, babus, brokers, middlemen, mafia and majority of them practice corruption and unfair methods religiously. They cannot even think of serving Tata salt to their children. What if the child become honest and nationalist. How they we show their face to their community? Poor guys! Why Tata salt did not even think of their concerns?

Remaining twenty percent public have over a dozen alternative of salts. So how much potential market left for India? An advice for them! Please take back this advertisement as soon as possible. This will increase their market share.

Advance wishes on Independence day to all of you!

Saturday, July 7, 2012

पिता

हर पिता को समर्पित!
Dedicated to every father!

पिता बना तो जाना
ये काम नहीं आसान
हर पिता को मेरा
शत शत है प्रणाम|

हर पल मन में एक लगन
सदा खुश रहे संतान
पल पल अमृत उसे मिले
सो खुद करते रहे विषपान|

टूटे चप्पल पावों में अपने
तन पर वस्त्र पुरान
नव वस्त्र बच्चों को मिले
जन्मदिवस, होली, रमजान|

अपने इक्षा को परे रख
जोड़े पुस्तक का दाम
हो अथक अनगिनत प्रयास
दिन रात वो करते काम|

शिक्षा, शक्ति, संस्कार आपसे
आज चलू जो सीना तान
मस्तक ऊँचा आपके कारण
है सफल पिता का प्रमाण |

क्षमा अपेक्षित है
जो भूल हुयी अनजान
त्याग, धर्म की मूर्ति
पिता हैं कितने महान|

पिता बना तो जाना
ये काम नहीं आसान
प्रिय पिताजी आपको
मेरा शत शत है प्रणाम|

- अमिताभ रंजन झा

Poems dedicated to mother:

माँ मुझको कलेजे से लगाये रखना

माँ तू याद आती है

आंतकवादी की माँ

हाड़ मांस का पुतला

- अमिताभ रंजन झा

Thursday, May 24, 2012

Fuel priced hiked again!



In my post on June 5th, 2011 titled "Are we bringing up chicken?" I expressed my frustration against the price hike.

Fuel priced hiked again!

Price of petrol in Delhi on May 2011 = Rs 63.37
Price of petrol in Delhi on May 2012 = Rs 73.14

In one year the petrol price increased by Rs 10.

In 1989 the price of petrol was Rs 8 per litre.
Rs 8 to Rs 73 in less than 25 years.

UPA brings more disappointments. Will NDA do any different?

During NDA regime in 19-03-98 to 22-05-04, LPG price increased from Rs 140 to 280 approx as displayed below.



UPA shame shame!
NDA stop blame game!

Government continue to increase fuel price,
what Opposition doing is always criticise|
In next election India vote for those,
who promises 50 % reduction in these price|

Sunday, February 19, 2012

पटना तुझसे नाता है गहरा

A song dedicated to my home town Patna. I have deep attachment with patna. Patna gave me many things and took away many things as well! Still home town is home town! I love Patna!



पटना तुझसे
नाता है गहरा
याद मुझे तेरा
सतरंगा चेहरा
कभी कभी
खुशियों का सेहरा
कभी दुःख का
घना सा कोहरा|

होली जलाना
रंग लगाना
दिया जलाना
फटाके चलाना
सरस्वतीपूजा में
चंदा जुटाना
ईद और छठ में
गलियों को सजाना|

गाँधी मैदा में
खेले खिलखिलाए
राजेंद्र घाट पर
अकेले आशु गिराए
काली घाट पे
पुष्प बहायें
बुद्ध घाट पे
कूदे नहाये|

साईकिल से निकला
कर कोई बहाना
यारपुर,अंटघाट
से लेके सब्जी लाना
लोयला, मिलर,
जादूघर आना जाना
तारामंडल, चिरियाखाना
हवाईअड्डा कभी ठिकाना|

बेलीरोड, बोरिंगरोड
फिर गंगा किनारा
अशोक राजपथ से
चला सिटी गुरुद्वारा
कंकडबाग, राजेंद्रनगर
चला कारवां हमारा
चिड़ियाटांड, गर्दनीबाग,
बुधमार्ग में घंटो गुजारा|

दीघा मालदह के
पेड़ो पर लटकना
गंगा के तट पर
यारों को पटकना
मंदिरी की तंग
गलियों में भटकना
गुपचुप खाना
इखरस गटकना|

चनाचूर, सोनपापड़ी,
खाजा, बताशा
कोज़ी मनेर का याद
स्वाद हमेशा
पाल, वसंत विहार का
स्वादिष्ट सा डोसा
लिट्टी, समोसा
कुल्फी,अनरसा |

जी कहता है
लौट के आऊ
बीता जीवन
फिर से दोहराऊ
एक दिन शायद
ऐसा हो जाये
फिर से पटना
घर हो जाये|

जीवन किस्मत
का है मोहरा
काम काज का
हर पल मुझपर पहरा
जब तू पुकारे
बनू में बहरा
पटना तुझसे
नाता है गहरा|

पटना तुझसे
नाता है गहरा|

- अमिताभ रंजन झा

Other version:

पटना तुझसे मेरा नाता बड़ा ही गहरा है याद मुझे तेरा सतरंगा चेहरा है|
कही यादों में खुशियों का सेहरा है कही दुःख का घना सा कोहरा है|

कभी होली जलाया रंग लगाया है कभी दिए जलाके फटाके चलाया है।
सरस्वती पूजा में चंदा जुटाया है पूजा के बाद गंगा में मूर्ति भंसाया है।

छठ में गली साफ़ कर के सीरीज लाइट से सजाया है सडको पर उजला वाला बालू बिछाया है|
ईद - बकरीद संग मिल के मनाया है एक दुसरे को गले भी लगाया है।

गाँधी मैदान में खेला खिलखिलाया है राजेंद्र घाट पर श्रद्धा के आंशु गिराया है।
काली घाट में हमने पुष्प बहाया है बुद्धघाट में जमके कूदा नहाया है|

दानापुर से सिटी तक साईकिल चलाया है बारिश में भींगा नहाया है।
मंदिरी, कंकडबाग, अशोक राजपथ, हवाई अड्डा को पैदल ही नापा है। .

आम अमरुद के पेड़ो के फुनगी पर लटका है गंगा के तट पर यारों को पटका है
मंदिरी की तंग गलियों में भटकनाहै गुपचुप खाना इखरस गटकना है|

चनाचूर, सोनपापड़ी, खाजा, बताशा है कोज़ी मनेर का याद स्वाद हमेशा है।
पाल, वसंत विहार का स्वादिष्ट साडोसा है लिट्टी, समोसा कुल्फी,अनरसाहै|

चनाचूर, सोनपापड़ी, खाजा, बताशा कुल्फी, लिट्टी, समोसा, अनरसा याद आता है।
कोज़ी, मनेर, वसंत विहार, मौर्या लोक, उमा मोना, वीणा, अशोक भूले न भुलाता है।

जीवन किस्मत का मोहरा है काम काज का हर पल मुझपर पहरा है।
जब तू पुकारे दिल बनता बहरा है पटना तुझसे मेरा नाता बड़ा ही गहरा है|

जी कहता है लौट के आऊ बीता जीवन फिर से दोहराऊ।
एक दिन शायद ऐसा हो जाये फिर से पटना घर हो जाये|

पटना तुझसे मेरा नाता बड़ा ही गहरा है पटना तुझसे मेरा नाता बड़ा ही गहरा है|

Saturday, January 8, 2011

कहानी गृह-कर्ज की

किसी ने सच कहा है: दुःख बांटने से घटता है, सुख बांटने से बढ़ता है. मैंने पिछले पोस्ट में अपने कर्ज तले दबे मध्यवर्ग के जीवन के दर्द को चित्रित करने का प्रयत्न किया था, उस लेख के बाद मन काफी हल्का हुआ. मैंने वादा किया था कि जीवन से जो सिखा है, आपके साथ बाटूंगा. सो हाजिर है "कहानी गृह-कर्ज की" या "दास्तान-ए-होमलोन".

वर्ष २००५ में एक फ्लैट ख़रीदा, बैंगलोर में. उस समय राष्ट्रीयकृत बैंको से गृह-कर्ज लेना टेढ़ी खीर थी, मैंने कुछ शाखाओं में संपर्क किया किन्तु कोई फायदा न हुआ. निजी बैंक झटपट कर्ज दे देते थे वो भी बहुत ही सहूलियत से. सो मैंने निजी बैंकों से संपर्क किया और आखिरकार एच. एस. बी. सी. बैंक से लोन एप्रूव हो गया, ७.२५ % फ्लोटिंग ब्याज दर पर, २० साल के लिए. कुछ दिनों में सब फ़ाइनल हो गया, और मुझे घर मिल गया. फिर दो महीने बाद एक लैटर मिला बैंक से कि ब्याज दर बढ़ा कर ७.७५% कर दिया गया है और मासिक किस्त की राशी बढ़ा दी गयी है. फिर तो ये सिलसिला हो गया और वर्ष २००८ के करीब में ब्याज दर बढ़ कर १३.७५% हो चुका था, मासिक किश्त लगभग दुनी हो चुकी था और समय सीमा २५ साल की हो गयी थी. बीते लगभग तीन सालों में, लिए गए कर्ज के एक तिहाई से ज्यादा कि रकम दे चुका था किन्तु मूल धन वैसे का वैसे ही था. सोचता रहता था कि ये क्या हो रहा है, ऐसा चलेगा तो मैं लोन कभी नहीं चुका पाउँगा. मुंशी प्रेमचंद जैसे महान कथाकारों कि कहानियों में सूदखोर महाजन के जाल में फंसे किसान हों या सत्यजीत रे जैसे महानुभावो के सिनेमा के किरदार, सब अपने लगने लगे थे, सबके दर्द को महसूस कर सकता था. सोचता रहता था कि सरकार क्या कर रही है? कैसे उन्होंने निजी बैंको को बेलगाम छोड़ दिया हमारा शोषण करने कि लिए? हालाँकि कर, सरचार्ज, इंधन, महंगाई इत्यादी बढ़ाने में सरकार कोई कोताही नहीं बरत रही थी और न आज ही बरत रही है. और हम सरकार और लेनदार के दो पाटों में पिस रहे थे, पिस रहे है.

वर्ष २००८ ही वो साल था जब मैं "रिच डैड पुअर डैड" पढ़ कर जागरूक हो चुका था. दुनिया में मंदी कि आंधी छायी थी. सरकार भी नींद से जागी और सब बैंको को ब्याज दर घटाने का निर्देश दे रही थी. सो मैंने एक दिन फ़ोन घुमाया एच. एस. बी. सी. कॉल सेंटर, बोला ब्याज दर कम करो नहीं तो किश्त देना बंद कर देंगे. असर हुआ, ब्याज दर १३.२५% हो गया. उसके पश्चात भी "आर बी आई" ने कई दफे "सी आर आर" में कटौती की पर बैंक ने ब्याज दर नहीं घटाया. मन में आक्रोश बढ़ता जा रहा था. उस समय राष्ट्रीयकृत बैंक भी गृह-कर्ज के रणक्षेत्र में उतर चुके थे. "एस बी आई" उनमे अग्रणी था सो मैंने एक शाखा में संपर्क किया, बोले कर्ज का स्थानांतरण संभव है वो भी करीब १०% ब्याज दर पर, १५ साल के लिए. मैंने एच. एस. बी. सी. में फिर संपर्क किया, वो बोले सब्र करने को, कुछ दिनों में ब्याज दर कम हो जायेगा, सरकार से बात हो रही है. मैं अड़ गया, अभी कम करो या मुझे माफ़ करो. शायद वो भांप चुके थे कि मेरा इस से ज्यादा दोहन नहीं कर सकते, मान गए, बोले २% पेनाल्टी लगेगा, सर्विश टैक्स अतिरिक्त. तीन साल में मूलधन का एक तिहाई से ज्यादा देने के बाद भी, मुझे उन्हें मूल धन से ज्यादा ही देना पड़ा. अवश्य ही उन पैसे से उन्होंने नया शिकार किया होगा. खैर अंततः मैंने लोन एस बी आई में ट्रांसफर करवा लिया. संतुष्ट हूँ उनकी पारदर्शिता से, ब्याज दर में भी कोई भारी बढ़ोत्तरी नहीं हुयी है न ही मासिक किश्त में. हालाँकि ग्राहक सेवा में काफी सुधार की गुंजाईश है. जब भी अतिरिक्त पैसे होते हैं, शौपिंग करने के बजाय झट से नेट बैंकिंग के द्वारा होम लोन खाते में ट्रान्सफर कर देता हूँ, एक हजार, दो हजार या कुछ भी. पिछले दो साल में मूलधन का लगभग एक चौथाई अदा कर चुका हूँ और विश्वाश है एक दिन ये कर्ज पूरा का पूरा चुका पाउँगा.

अपने घर का सपना संजोये मध्य वर्ग का दोहन बैंक तो करती ही है, रियल स्टेट एजेंट्स और राजनीतिज्ञों द्वारा अलग शोषण होता है. प्रोपर्टी व्यवसायी भ्रष्ट राजनीतियों से सांठ-गाँठ कर विकासशील शहर के आस पास की जमीन भोले-भाले ग्रामीणों से कौड़ी के भाव पर खरीदते है, और हमें आसमान छूटे भाव देने पड़ते है. ये अलग चिंता का विषय है, कभी विस्तार से लिखूंगा इस विषय पर.

गृह-कर्ज के अनुभव ने मुझे ये सिखाया है कि निजी बैंकों से कभी कोई कर्ज नहीं लेना चाहिए. आप कभी भी निजी और राष्ट्रीयकृत बैंक की तुलना करे, निजी बैंक का ब्याज दर हमेशा ज्यादा होता है, उनकी शर्ते पारदर्शी नहीं होती हैं. वो आपको फ्लोटिंग रेट पर कर्ज थोपने की कोशिश करते हैं और फिर एक बार आप उनके जाल में फँस गए, वो कर्ज का ब्याज दर बढ़ाते जाते हैं. आप उनके जाल में छटपटाते रह जाते है. राष्ट्रीयकृत बैंक थोड़ा समय लेते है पर काम आपके हित में होता है.

जो लोग निजी बैंक से कर्ज ले चुके हैं उनको कहना चाहूँगा, लोन ट्रान्सफर करवा ले राष्ट्रीयकृत बैंक में, फायदे में रहेंगे. तनिक भी देर न करे, आपका आलस्य आपको हर दिन महंगा पर रहा है. अपने मेहनत की कमाई ऐसे व्यर्थ न जाने दे. जागें, अपनी आँखें खोल ले और दुसरो को भी जागरूक करे. आप अपने अनुभव कमेंट्स सेक्सन में पोस्ट कर सकते हैं, कृपया अवश्य पोस्ट करें.

अगले पोस्ट में क्रेडिट कार्ड्स के अनुभव को लिखूंगा.

Thursday, January 6, 2011

मध्यवर्ग आर्थिक समृधिकरण

परेशान रहता हूँ आज कल अपने आर्थिक स्तिथि से, मध्यवर्ग से जो हूँ. घर का लोन, निजी लोन, कार लोन, क्रेडिट काड्र्स, ओवरड्राफ्ट, जीवन रक्षा प्रीमियम, कार प्रीमियम, ये कर्ज वो कर्ज इत्यादि इत्यादि. इनका शिकार हम मिडल क्लास के लोग ही क्यों बनते हैं? तनख्वाह कब हवा हो जाती है पता ही नहीं चलता. "वेळ डन अब्बा" चलचित्र में बोमन ईरानी शाहेब से सहमत हूँ, बहुत सही कहा है "जिस दिन महीने का वेतन मिलता है हम गरीबी रेखा से ऊपर आ जाते हैं और अगले ही दिन नीचे चले जाते हैं". अब बाकी का जो दो चार टका बचता है वो घर के खर्च में निकल जाता है, फ्लैट का मेनटीनेन्स, कामवाली का पगार, बिजली, अख़बार, फ़ोन, मोबाइल, इन्टरनेट, केबल का बिल, ये बिल, वो बिल, हे भगवान. राशन के लिए क्रेडिट कार्ड्स के सिवा कोई दूसरा चारा नहीं बचता है. अच्छी नौकरी, अच्छी तनख्वाह, फिर भी ये आलम है. मेरी हालत पे पिताजी अक्सर चुटकी लेते है, दस हजार में हम पूरा परिवार चलाते थे आप इतना कमाते है फिर भी ये हाल है, आ जाईये पटना. अकसर सोचता हूँ, सोचता रहता हूँ, क्या हो रहा है ये, कब तक होता रहेगा ऐसा. शायद आप में से बहुतो को ये कहानी जानी पहचानी लगेगी, नहीं?

कुछ साल पहले एक किताब पढ़ी, "रिच डैड पुवर डैड". अच्छी किताब है, सोचा ये किताब दस साल पहले क्यों नहीं पढ़ी. जब मौका मिले जरुर पढ़िए. जरुरी नहीं है कि आप किताब की हर बात का अनुसरण करे पर ये आपका फिनान्सिअल आई क्यू (आर्थिक या वित्तिक बुद्धिमता) अवस्य बढ़ाएगा. हालाँकि ये किताब आपको खुद का बिजनेस करने को उत्साहित करती है, मेरा मानना है कि नौकरी में रहते हुए भी आप खुद को को समृध कर सकते हैं. आप सारांश यहाँ पढ़ सकते हैं: http://www.wikisummaries.org/Rich_Dad,_Poor_Dad

स्वीकार करना चाहूँगा कि दिमाग का अंग्रेजीकरण हो चुका है, हिंगलिश का आदि हो गया हूँ (कभी विस्तार में लिखूंगा, ये कैसे हुआ). हिंदी के शिक्षक पढेंगे तो माथा पीट लेंगे, नंबर देने लगे तो कम से कम -१०० तो देने ही होंगे. हाँ, इंची के हिसाब से नंबर देते होंगे तो हम पास अवस्य हो जायेंगे. जो लोग इंची कॉपी जाँच प्रणाली से उनके लिए एक लघु-परिचय: इंची प्रणाली परीक्षा की कॉपी जाँच करने की एक अनोखी प्रणाली है जिसमें लिखे लेख, उत्तर इत्यादि की उंचाई (इंच में) के हिसाब से अंक दिए जाते है. जब बहुत सारी कापियों का आंकलन कम समय में करनी हो तो ये प्रणाली बहुतो द्वारा अपनाई जाती है. उस प्रणाली का आदि हो गया हूँ, कुछ भी लिखू उसको लम्बा करने में लगा रहता हूँ कि कम से कम पास कर जाऊं. इस प्रणाली कि त्रुटी ये है कि मेधावी छात्र को भी औसत आंकलन से संतोष करना परता है. विद्यालय का नाम, विद्यार्थी का लास्ट नेम, कॉपी में कुछ कोड शब्द इत्यादि औसत आंकलन को बेहतर कर सकते हैं. कभी विस्तार में लिखूंगा.

हाँ तो मैं कह रहा था निजी आर्थिक समृधिकरण के बारे में, पहले न जाने कितने शलोक पढ़े, दोहे पढ़े, कहानिया सुनी, उपदेश सुना मितव्ययिता के बारे में, बात दिमाग में नहीं घुसी. जब विदेशी लेखक कि अंग्रेजी किताब पढ़ी, आँखें खुल गयीं. चलो सुबह का भूला शाम को घर आ जाये तो उसको भूला नहीं कहते. मन में सोच लिया है "एसेट क्वाडरंट मजबूत करना है, एसेट बढ़ाना है और लाएबिलिटी कम करना है". योजना बनाया हर खर्च से पहले खुद से पूछुंगा ''जरुरी है क्या, क्यों करना है".

अब हर खर्च से पहले सोचता हू, क्यों? पहले बैंक, लोँन, क्रेडिट कार्ड्स, इंश्योरंस के पत्र सीधे कचरे में डालता था. अब पढ़ने लगा हूँ. जब से ध्यान देना शुरू किया है काफी कुछ सीखने को मिला है. अगले पोस्ट में बताऊंगा टिप्स एंड ट्रिक्स, शायद आपके काम आ जाए!

Sunday, September 26, 2010

बैजू और भोलू

आज मैं आपको कहानी सुनाऊंगा बैजू और भोलू की|

इससे पहले मैं ये स्पष्ट कर दूं कि कहानी के सारे पात्र काल्पनिक है|

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बैजू और भोलू
___________

एक समय की बात है, एक गांव था, हरा-भरा और खुशहाल| उस गांव में दो परिवार पास-पास रहते थे| दोनों परिवार में मधुर सम्बन्ध थे, आना-जाना था, खान-पीन था, सुख-दुःख का साथ था| परिवार के बुजुर्ग दादाजी लोग साथ गप्पे लड़ाते, शतरंज खेलते| दादियाँ सवेरे साथ-साथ पूजा के फूल तोड़ने जाती, शाम आरती के गीत साथ-साथ गातीं| पिता साथ खेत में काम करने जाते, माँ साथ मंदिर जातीं|

संयोग या विडम्बना कहिये, दोनों परिवार अगले पीढ़ी के संतान का इन्तजार बरसों से कर रहे थे| वे मन्नते मांगते, फरियाद करते, पर पूरी न होती| आखिरकार चौदह साल कांवर लेकर, वैद्यनाथ बाबा के दर्शन के बाद दोनों परिवार की मन्नत पूरी हो ही गयी| बाबा की कृपा से दोनों परिवार को पुत्र-रत्न की प्राप्ति हुयी| संयोग देखिये, एक ही दिन, एक ही घडी में| एक सेकंड का भी अंतर नहीं| परिवारों ने दोनों बच्चो का नाम बाबा के नाम पर रखा, वैद्यनाथ सिंह (बैजू) और भोलानाथ सिंह (भोलू)| एक बहुत ही प्रसिद्ध ज्योतिषराज से बच्चो की जन्मकुंडली बनवाई गयी जिन्होंने बताया की दोनों बच्चे जगत में बहुत नाम कमाएंगे|

बच्चे बड़े होने लगे| खाते-पीते घर से थे सो अच्छी परवरिश होती रही, प्रभु के कृपा से किसी चीज़ की कमी नहीं हुयी| समय बदला, जैसा कि पड़ोसियों में होता है, दोनों परिवार अपने बच्चे को अच्छा साबित करने में पीछे नहीं छूटते जिसका असर बच्चों पर भी होता गया | दोनों बच्चे साथ खेलते, कभी लड़ भी जाते| जब भी कोई खेल या प्रतियोगिता या इम्तिहान की बात होती, बैजू फटाक से भोलू को कहता, माँ का दूध पिया है तो आ जा मैदान में| दोनों अपनी जान लगा देते किन्तु जीत हमेशा बैजू सिंह की ही होती| ये सिलसिला उनके से बचपन से शुरू हुआ और चलता रहा| बैजू हमेशा जीतता रहा, अव्वल आता रहा| भोलू हमेशा दुसरे नंबर पे रहता और इसे ही अपनी नियति मान लेता| दोनों बड़े होते गए|

उसी समय महापराक्रमी दारा सिंह जी का उदय हुआ और दोनों बच्चे ने उनसे प्रभावित होके कुश्ती को अपना धर्म बना लिया| दोनों साथ लड़ते, अभ्यास करते| दोनों ने काफी प्रगति की| विद्यालय के स्तर से शुरुवात हुयी, फिर गांव, शहर, जिला, राज्य, और राष्ट्रीय स्तर पर जा पहुचे| किन्तु भोलू कभी बैजू से न जीत पाया| और एक दिन आया की दोनों का एशियन गेम्स के लिए चयन हो गया| दोनों फ़ाइनल में भी पहुच गए| बैजू ने वहा भी भोलू को माँ के दूध के हवाला दिया| दोनों जोड़ से लड़े| जैसा की होता आया था, जीत बैजू की ही हुयी| सौ कड़ोड़ की आबादी वाले देश के लिए गर्व की बात थी, स्वर्ण और रजत दोनों हासिल हुए| लोगों ने वापसी पे उनका पुरजोर स्वागत किया| सरकार, और निजी कंपनियों ने उन्हें इनामों से मालामाल कर दिया| दोनों मायानगरी में जुहू के पास एक आलीशान अपार्टमेन्ट में आमने सामने के घर में आ गए| अपार्टमेन्ट का माहौल मोहक, मादक और आकर्षक था, बोलीवुड के बहुत सारे अभिनेता, अभिनेत्री, नर्तक, नर्तकी, मॉडल इसकी चहल पहल को और बढ़ाते|

दो साल बाद ओलंपिक गेम्स हों वाले थे| बैजू ने घर में ही अखाडा और जिम बना लिया था| दिन रात मेहनत करता, शायद ही कभी अपार्टमेन्ट से बाहर निकलता| भोलू पड़ोस में एक आधुनिक जिम में जाता| वही उसकी मित्रता बॉलीवुड की उभरती हुयी अभिनेत्री से हो गयी| दोनों अक्सर जिम में मिलते, फिर धीरे धीरे बाहर भी मिलने लगे| एक दिन दोनों ने शादी कर ली और ख़ुशी ख़ुशी रहने लगे| कुछ दिन बाद भगवन ने उन्हें एक औलाद भी दे दी|

बैजू और भोलू दोनों ओलंपिक के लिए जी तोड़ मेहनत करते रहे और एक दिन आया की दोनों का चयन भी हो गया| ओलंपिक में दोनों ने बड़े-बड़े पहलवानों को चुनौती दी, धुल चटाया और, खूब लड़ा और सेमी फ़ाइनल तक पहुँच गए| बैजू दुसरे स्थान पर था और भोलू चौथे स्थान पर| सौ कड़ोड़ की आबादी वाले देश के लिए ख़ुशी का पल था और लोग स्वर्ण और रजत पदक की कल्पना से अभिभूत थे| सेमी फ़ाइनल में प्रतिद्वंद्वी उनसे भारी पड़े और कड़े मुकाबले में दोनों पराजित हो गए| देश के लिए गम का माहौल था तो संतोष भी की सौ कड़ोड़ की आबादी वाले देश के लिए कम से कम एक कांस्य पदक पक्की है| अब कांस्य पदक के लिए चिर प्रतिद्वंधियों को आपस में लड़ना था|

मैच शुरू होने को था, दोनों पहलवान रिंग में थे| बैजू ने शरारत से फिर भोलू की कान में कहा, माँ का दूध पिया है तो आ जा मैदान में| मैच शुरू हुआ, पहला राउण्ड, दूसरा, तीसरा, हर राउण्ड में भीषण मुकाबला होता रहा| बैजू चकित था, उसे भोलूसे कभी इतना प्रतिरोध नहीं मिला था| दूरदर्शन पर मैच देख रहे बैजू के परिवार वाले और प्रशंसक विस्मित थे तो भोलू के परिवार वाले और प्रशंसक अचंभित| और अब अंतिम राउण्ड आ चुका था| मैच शुरू हुआ, कड़ा मुकाबला, परम संघर्ष, पुरजोर प्रयास| दोनों एक दुसरे को पछाड़ने में कोई कसर नहीं छोड़ रहे थे, अंतिम कुछ पल बाकी थे, दोनों बेदम हो चुके थे और जमीन पर थे, उठ नहीं पा रहे थे , और अंतिम गिनती चल रही थी| फिर ये क्या हुआ? भोलू ने हिम्मत बटोर कर बैजू की तरफ मुंह किया, उस पर कूदा और उस को चित्त कर दिया| बैजू के परिवार वाले और प्रशंसक की आँखों में शोक के आंशु थे तो भोलू के परिवार वाले और प्रशंसक की आँखों में हर्ष के| ऐसा कभी हुआ न था, अनहोनी हुई, भोलू विजय हुआ|

बैजू टूट गया, शोक में डूबा रहा| पर बैजू मन का मजबूत था, मन में ठान लिया, अगले प्रतियोगता में देख लेगा| और दुनिया को भूल कर फिर से कड़ी मेहनत में लग गया| फिर कॉमन वेल्थ गेम्स हुए, भाग्य देखिये यहाँ भी बैजू भोलू से पराजित हो गया| अब ये सिलसिला चलता रहा, समय का पहिया घूमता रहा, वो कभी भोलू से जीत न पाया| एक समय आया दोनों रिटायर हो गए|

बैजू ने शादी कभी की नहीं, बिलकुल अकेला रहा, और हार का संताप| बैजू बीमार रहने लगा| एक दिन डॉक्टरों ने जवाब दे दिया| बैजू ने भोलू को बुलाया और उस से पूछा, आखिर क्या हुआ कि उस ओलंपिक मुकाबला के बाद वो कभी उस से जीत न पाया? भोलू मुस्कुराया और उसके कान में कुछ फुसफुसाया| बैजू चकित रह गया, उसकी आँखे खुली रह गयी और उस के कानों में भोला की आवाज गूंजने लगी "बैजू तुने सिर्फ माँ का दूध पिया| तुमने सिर्फ खेल पर ध्यान लगाया और अपनी दूसरी जरूरतों को कभी पूरा नहीं किया| जीवन में सफल होने के लिए व्यक्तिगत विकास, स्वास्थय, सम्बन्ध, मित्र, मनोरंजन इत्यादि भी अवश्यक हैं| जब जीवन में संघर्ष बढ़ता जाता है तो ये मनोबल बढ़ाने में, तनाव दूर करने में काम आते है|" पर अब पछताए होत क्या जब चिड़िया चुग गयी खेत| उसने वही प्राण त्याग दिए|

- अमिताभ रंजन झा

Sunday, June 27, 2010

गंगा के दो किनारे



आपने दिल तोड़ दिया
हमसे मुंह मोड़ लिया
हमको अकेला छोड़ दिया
हम छोड़ ना पाए|

खुशियों के मौसम बीते
अब यादों के मौसम आये
मन में ऐसे टीस जगाए
हमको हर पल तड़पाऐ|

गंगा से ली गीली मिट्टी
प्यार का डाला बालू गिट्टी
बाते की कुछ मीठी खट्टी
रेत पे हमने घर भी बनाये|

इंतजार में तेरे हमने
कितने पत्थर नदी में डाले
कितने पंखुरी फूलों से निकाले
हम गिन न पाए|

बाँहों में तुझको लेके
जुल्फों के साये में सोके
झील सी आँखों में खोके
हरदिन सूरज हमने डुबाये|

गोद में तेरे सर रखकर
ओस में कितनी राते काटी
चंदा से की जी भर बातें
तारो से भी नैन मिलाये|

सतरंगा अपना शहर हो
नदी किनारे छोटा घर हो
सारे जगकी ख़ुशी मगर हो
मीठे सपने हमने सजाये|

टूट गए वो सारे सपने
हमें रुलाया सारे जगने
हुए पराये अब तो अपने
अब भी हम जाग न पाए|

देखू तुझे दिल करे इशारे
मन ही मन तुझे पुकारे
पर गंगा के हम दो किनारे
सामने हैं पर मिल न पाए|

आपने दिल तोड़ दिया
हमसे मुंह मोड़ लिया
हमको अकेला छोड़ दिया
हम छोड़ ना पाए|
छोड़ ना पाए|




- अमिताभ रंजन झा
http://amitabh-jha.blogspot.com/search/label/Poems