Saturday, September 26, 2020

मुझे मना लेना

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मैं तेरे दरवाजे पे कल आया था
धड़कते दिल से खटखटाया था
तूने अंदर बुलाया, नहीं आया था
चाय जो पूछा, हाँ न कह पाया था

दिल से मजबूर मैं फिर आऊँगा
फिर से कोई बहाना बनाऊंगा
आज भी तुम चाय को पूछोगी
मैं शर्माऊँगा, फिर मेरी ना होगी

कहूँ अगर कि मैं चाय नहीं पीता
कॉफ़ी ही पी लो, तुम ये कहना
मैं कुछ भी कहूँ तुम मना लेना
बन गयी है, कह के पिला देना

मैं कहूँ कि गर्मी है आज बहुत
नींबू का शर्बत ही तू बना लेना
ना कितना भी करूँ, मना लेना
मुझे पीना है ,कह के पिला देना

मिन्नते करना, मैं रुक जाऊँगा
दो पल साथ रह, खुल जाऊँगा
अपनी यादों से दिल बहलाऊँगा
अपनी बातों से बहुत हँसाऊँगा

शर्मिला हूँ पर मन का सच्चा हूँ
मिलने मिलाने में जरा कच्चा हूँ
जवानी की दहलीज पे बच्चा हूँ
सीधा सादा सा हूँ बड़ा अच्छा हूँ

तू मिले ज़िन्दगी संवर जाएगी
ज़िन्दगी खुशियों से भर जाएगी
मोहब्बत की कली खिल जाएगी
मांगी है जो मन्नत वो मिल जाएगी

Thursday, September 24, 2020

राजनीतिज्ञों की प्रतियोगिता

राजनीतिज्ञ दुहने में माहिर होते है। नहीं होते तो शीर्ष पर नहीं पहुंच पाते। शायद इस तथ्य से प्रेरित होकर आयोजकों ने मंगल ग्रह पर एक बार अखिल ब्रह्माण्ड के जाने माने राजनीतिज्ञ द्वारा दूध दूहने की प्रतियोगिता का आयोजित किया। सब नेता को अपना परिचय देना था और उनका नाम कैसे पड़ा ये बताना था और फिर दूध दूहना था। एक से एक धुरंधर आये, परिचय, नाम का कारण बताये और फिर दूध का झड़ी लगा दिये। पाँच, दस, बीस, पच्चीस लीटर। निरंतर गोदीजी आये। बताया बचपन से निरंतर गोदी में रहते थे सो नाम पड़ा। गोदी में अब भी कुछ लोग लेना चाहते हैं, मीडिया, भ्रष्ट, स्वार्थी, लोग। काला धन काला मन वाले लोग। धमाकेदार एंट्री हुआ एक दो तीन चार पांच छ सात आठ कदम चले कैमरे की तरफ फिर ज्योति जला के आयोजन किया। उनके लोगों ने स्टेडियम में लाइट गुल कर भीड़ में सैकड़ों सिक्के उछाले गए. लोग मोबाइल में टोर्च जला के सिक्के पाने की होड़ में लग गए. मीडिया ने खबर चलाया मोदी ने ज्योति जला के उद्घाटन किया जनता का अपार समर्थन। जल्दी जल्दी वस्त्र बदला फिर से एक दो तीन चार पांच छ सात आठ कदम चले कैमरे की तरफ और थाली बजाया। फिर से जल्दी जल्दी वस्त्र बदला एक दो तीन चार पांच छ सात आठ कदम चले कैमरे की तरफ और मयूर के पीछे चलने लगे। मीडिया बढ़ चढ़ के कवर करती गयी। मित्रों और जनता को धन्यवाद दिया प्रतियोगिता देखने उमड़े अपार भीड़ को, सम्पूर्ण राष्ट्र को नोटबंदी, देश बंदी के समर्थन के लिए जीएसटी सीएए एनपीआर के समर्थन के लिए ह्रदय से धन्यवाद दिया। घंटों मन का बात किये। लोग मंत्रमुग्ध हो कर सोते चले गए। मीडिया बढ़ चढ़ के कवर करती रही। गोदी जी फिर पूरी मेहनत से पंद्रह लीटर दूहे। सेक्रेटरी से पूछे इतना कम क्यों हुआ? क्यों हाल दिल्ली राजस्थान और एम पी चुनाव वाला हो गया? सेक्रेटरी बोला देसी गाय है जर्सी गाय का खाल पहना के लाये हैं। हाइप क्रिएट करना पड़ता है। आप पंद्रह निकाल दिए, दुसरा पांच लीटर भी नहीं निकाल सकता था। फिर सेक्रेटरी इशारा किये भीड़ के तरफ़। हर तरफ गोदी गोदी की गूँज। जज पूछा कितना है? गोदीजी इमानदारी से बोले फ़िफ्टीन। सेक्रेटरी सजग था, देश की ईज़्ज़त का सवाल था। उनके कहने से पहले तमाम मीडिया, समर्थक लोग हल्ला मचा दिये, फिफ्टी, फिफ्टी। फिफ्टीन फिफ्टी बन गया। बस स्कोरर उनको देबामा जी से भी ऊपर डाल दिया। भीड़ फिर से चिल्लाई गोदी गोदी गोदी गोदी। 'देबामा' जी मन मसोस के रह गए मन ही मन बोले बेटा मालूम था तू दुनिया को पीछे छोड़ देगा। इसलिए तोहरा कहियो हमरे इहा का वीसा नहीं दिए। जनता पीएम बना दिया तो मज़बूरी में देना पड़ा। ये सोच ही रहे थे कि खुराक देबामा जी का नंबर आया। खुराक ज्यादा था बचपन से ही। चौबीस घंटे माँ का दूध पीते रहते थे जब बच्चे थे। जब से बोलना सीखे हरदम कहते खुराक देबा माँ। सो नाम पड़ गया खुराक देबामा। बड़े हो गए हैं, शादी भी हो गयी है, दो बेटी भी है। लेकिन दूध खुराक अभी भी वही है। पहले कहते खुराक देबा माँ अब कहते हैं खुराक देबा बुच्ची के माँ? आने के साथ ही जितनी भी महिला वहा उपस्थित थीं सबको सबसे खूबसूरत कहते गये। महिला लोग को बुरा नहीं लगा लेकिन मीडिया को बर्दाश्त नहीं हुआ। हंगामा मचा दिये। देबामा जी माफ़ी मांग के आगे बढ़े। ऐसे ही परेशान थे, वाइट हाउस से निकल चुके थे कबके, सदा के लिए। सोच रहे थे हिलेरी कीर्तन का हाल लाकी अडवाणी वाला हो गया ये बुड्ढी प्रेजिडेंट इन वेटिंग वो बुड्ढा पीएम इन वेटिंग सदा के लिए। खैर, आये एकदम गंग्नम स्टाइल में, लाये अपनी जर्सी गाय आ धराधर दूह दिए चालीस लीटर। फिर नंबर आया रहल गन्दे का। महीन स्वर में बोले हम बच्चा में गन्दा रहा करते थे। माँ कहती तू हरदम रहे लअ गन्दे। सो नाम पड़ गया रहल गन्दे। बोले अब भी जब साफ़ कुरता बर्दाश्त नहीं होता है, देहात में जा के मिट्टी, कचरा उठा लेते है। तलब भी पूरा हो जाता है और वाहवाही भी मिल जाता है। बीच बीच में लंबी छुट्टी ले तन मन की सफाई के लिए गायब हो जाते हैं। लौटते ही गोदी जी और उनमें उनके दलों में उनके आई टी सेलों में वाक् युद्ध शुरू हो जाता है। एक दूसरे को ऐसी ऐसी उपमा ऐसी ऐसी गालिया, अपशब्द दे दी जाती हैं की स्लम में रहने वाले भी शर्मा जाएँ। मीडिया प्राइम टाइम में शुरू हो जाती है लोग चैनल बदल बदल के परेशान। खैर, रहलजी अब भी विशेष ट्रेनिंग ले के लौटे थे। ज्यादा ही जोश में थे। धराधर तीस लीटर दुह दिए। सेक्रेटरी बोलता रह गया सर सर छोड़ दीजिये, लोग को पता चल जायेगा स्विट्ज़रलैंड का गाय है। माँ माथा पकड़ के बैठी बड़बड़ाने लगी बोली मना किये थे, कहे थे कम दूहो। पर सेक्रेटरी भी शातिर थे। इशारा किये, भीड़ से समर्थक हल्ला करने लगे। रहल रहल। जज पूछा कितना? वो बोले थर्टी। भीड़ से गूँज आयी थर्टीन थर्टीन। थर्टी थर्टीन हो गया। माँ को भी चैन आया। फिर आया नंबर आकेलेस का। बोले घर में जब भी बिजली काटता नेताजी पप्पा कहते आ के लेस डिबिया। सो नाम पड़ गया। दुहना शुरू करने वाले थे कि चाचा गाय को साइकिल पर ले के भाग गए। आकेलेस पीछे पीछे भागे तो चाचा अपने भाई के घर घुस गए फिर मीडिया बुला के भाई के हाथों आकेलेस को बेदखल कर दिए। आकेलेस मीडिया को बोले चचा अपने दोस्त से मिल कर हमको औरंगजेब घोषित कर दिए। चाचा बचपन में खिलौना छीनते थे अब माइक छीन लेते हैं। दुनिया उगते सूरज को पूजती है नेताजी अस्त हो रहे हैं, जाहिर है, दल में सबका स्वार्थ सिद्धि आकेलेस से ही हो सकता है। सो दल वाले आकेलेस के साथ हो लिए। नेताजी को मार्गदर्शक बना दिया गया। न दल में समर्थन न जन में समर्थन फिर भी नेताजी चाचाजी और मर्जी ढींठ की तरह अड़े रहे। हंसी के पात्र बने रहे। आकेलेस अब भी गाय और साइकिल का इन्तजार कर रहे है। जैसे ही दोनों मिला दुहना शुरू कर देंगे। लेकिन पता नहीं मिलेगा। प्रदेश में नाम बदलने का माहौल है पता नहीं किसका किसका नाम बदल जाए। शहर तो शहर सब्जी, दाल, पशु, पंक्षी, निर्जीव, सजीव, भगवान् भी डरे सहमें हैं कहीं उनका नाम भी न बदल जाए। फिर आये लेले प्रसाद। बोले बचपन गरीबी में बिता। प्रसाद खा गुजारा होता, लोग प्रसाद देते और कहते लेले प्रसाद, सो नाम हो गया। किसी जे पी आंदोलन में उभरे इतने बड़े समाजवादी कि पहले अपने भाई, सालों को समाज वादी बनाया फिर अपनी पत्नी को समाजवादी बनाया यहाँ तक की बच्चों तक की शिक्षा छुड़वा समाजवाद में लगा दिए। लोग आरोप लगते रह गए समाजवाद = परिवारवाद। पर किसी को घंटा फर्क पड़ा। उनका समाजवाद दौड़ता है दौड़ता रहेगा। दुनिया का सबसे दुधारू गाय ले के आये थे। दुहने बैठे की गाय लात मार दी। लेले प्रसाद ऐसे ही डरे थे कही दोनों तेज पुत्र उनको भी मार्गदर्शक न घोषित कर दे। उपर से मैडम बोली ऐ साहब इ का हो गया। प्रसादजी झन्ना के बोले चुप्प, मुंह बंद। इधर गाय बोली सब चारा खुद खा लेते हो और दूध दुहने आ जाते हो। लोग हंसने लगे बड़ी जग हँसाई हुयी। उसके बाद धोती कुरता पहने बत्तीस कुमारजी का नंबर आया। मुस्कुराए, बत्तीस दांत दिख गये। बोले ज्यादा नहीं बोलूंगा, गर्भावस्था से ही बत्तीस दांत हैं। सो नाम पड़ गया। इन्तजार करना पड़ा, उनका गाय नहीं आया था। सेक्रेटरी बोला सर विरोधी लोग गाय भगा दिया है। गोदी जी के दल से फुसफुसा कर बोले जरूर कसाईघर वाले का काम है। दंगाई लोग का काम है दंगा करना। कही बकरी के मांस खाते लोग को पीट के अधमरा कर दिए, कही मृत गाय को ठिकाने लगाने वाले लोग का ठिकाना लगाने लगे। बदले में कही योग सूर्यनमस्कार कर रहे लोग की लगा दी गयी। कहीं नबी के शान में गुस्ताखी के अफवाह में सड़क घर जला दिए गए. हर तरफ हैवानों ने मासूम इंसानों की लगा दी इंसानियत फिर से सहम गयी। बत्तीसजी ने कुछ महीनों के लिए गोदी जी से कट्टी कर लिये थे. लेले प्रसाद जी अपने दोनों तेजों के साथ बत्तीसजी से चिपक गए थे। लेकिन जल्दी ही बत्तीसजी घर वापसी कर लिए. खैर गोदीजी का सेक्रेटरी एक आयोजक को इशारा किये। वो आयोजक जो दिया बत्तीस जी उसी को दुहने लगे। सुबह से शाम हो गया। रात हो गया। बेदम हो गए लेकिन दुहते रहे। जज उनका बाल्टी देखा तो पता चला एक पौवा भी नहीं था। जज हँसा, इ हिह ही इ हिह ही कटाक्ष से बोला इतना देर में इतना ही? फिर ऊपर देखा, होश उड़ गये। इ त सांड था। बत्तीसजी बोले गोदीजी को ऊपर रहने दिजिये, उनको राज्य भी जर्सी गाय जैसा ही मिला था। हमरा किस्मत, राज्य भी मरना सन्न सांड जैसा ही मिला था। हम तो बस भाग लेने आये हैं, रैंक का मोह नहीं है। लेल प्रसाद जी के दोनों तेज पुत्र फुरफुसाये पलटू चचा सांड से दूध? बत्तीस जी बोले बुरबक, इज्जत रखना था ना। मेहनत कर रहे थे, जो पसीना आ रहा था उसको चुनौटी के चुना में मिला के बाल्टिया में गिराते गये। बत्तीस दांत निकाल एक आँख दबा के इही ही ही कर दिए। बोले जज लोग एक हफ्ता का समय देता तो गोदी जी को पीछे छोड़ देते। सेक्रेटरी को आँख मारे बोले जनता सब देख रही है, लेकिन वही जो हम दिखा रहें हैं। फिर नंबर आया गमथा दीदी का। बोली जिंदगी में बहुत गम था सो नाम पड़ गया। गुसैल मिजाज थी, एक बार तो गुस्सा में टाटा को राज्य से ही टाटा कर दिया। दीदी के कुछ भाई लोग कसाई बनने लगे, व्यापारियों के लिए चिट्ट फण्ड इन्वेस्टर के लिए। अब भी गुस्से में थी, धरना पे बैठ गईं। बोली अब या तो री-मोनिटाइजेसन होगा या डी-गोदी-टाइजेसन। तभी दूध दुहेंगी। मगर न तो री-मोनिटाइजेसन हुआ न ही डी-गोदी-टाइजेसन। अभी तक धरने पे ही हैं। अगला नंबर आया दोनाल ट्रंक का। पत्नी के हाथ पकड़ के साथ चले पत्नी ने नाक भौं सिकोड़ हाथ छुड़ा लिया। खैर, आयोजन स्थल पर हर उपस्थित महिला को देख उनके मुंह से पानी आता गया। मंच पर पहुँच के बोले पप्पा का कंट्रक्शन का धंधा था। एक प्रोजेक्ट ख़तम होता तो दूसरे प्रोजेक्ट दूसरे जगह पर शुरु हर छौ महीना साल भर पर शिफ्ट होते रहते। उनके पास फेवरिट नकली दोनाली बन्दुक और ट्रंक भर खिलौना था। जिसको वो किसी को न छूने देते। सो नाम पड़ गया दोनाल ट्रंक। आयोजक से बोले उनको देसी गाय चाहिए देसी नस्ल हो और श्वेत हो। उनके लिए गाय ढूंढा जा रहा था समय लग रहा था। एक गाय को बाहत ढूढ़ने के बाद लाया गया। दूध दुहने गए तो गाय धरना पे बैठ गयी। बोलने लगी बौ बौ मी टू। ये सुन कर आस पास की गायें भी बोलने लगी बौ बौ मी टू मी टू। पूरा स्टेडियम का स्पीकर गूंजने लगा बौ बौ मी टू मी टू। दोनाल बोले ये देशद्रोहियो की चाल है। तब तक किसी दूसरे देश के हैकर्स ने स्पीकर्स तो हैक कर लिया। पूरा स्टेडियम का स्पीकर पर गूंजने लगा बौ बौ स्वीटू। हैकर्स ने कुछ समय के लिए स्टेडियम की बिजली भी गुल कर दी। बिजली वापिस आयी तो बाल्टी दूध से भरा हुआ था। नापा तो 56 लीटर। खुश हो के बोले मेरे मित्र का सीना 56 इंच का है तो 56 लीटर दूहे। भीड़ में टोपी पहने कुछ लोग हल्ला मचा रहे थे हरमन केजड़ेबाल को काहे नहीं बुलाये इ प्रतियोगिता में। सब प्रतियोगी मुस्कराने लगे मने मन सोच के जो आयकर बिभाग में हो कर भी दुहना नहीं सीख पाया यहाँ कैसे गाय दूह पाता। केजड़ेबाल स्टेडियके बाहर झाड़ू ले के सफाई ही करने लगे जब नहीं घुसने दिया लोग. चुनाव का टाइम था इलेक्शन कमिसन से शिकायत हो गयी देश के सारे झाड़ू को छुपा दिया गया तो फिर कमल, हाथी, साइकल की भी शिकायत हो गयी। उनको भी छुपा दिया गया। फिर हाथ की भी शिकायत हो गयी। तो सबको शोले का ठाकुर कुर्ता पहनने की हिदायत दी गयी। खैर, केजड़ेबाल उधर ही धरना पर बैठ गए और एक गौ-पाल बिल का स्वांग शुरू। और बड़बड़ा रहे थे हमरा देख के बचपने से हर मनके जड़े बाल एही लिए हमरा नाम हरमन केजड़ेबाल।

Thursday, May 21, 2020

Sunday, October 6, 2019

सरफ़रोशी

सरफ़रोशी

फिर सिरफिरों में वही है सरगोशी
फिर सरफ़रोशों की है सरफ़रोशी
फिर गांधीके शहादत सी ख़ामोशी
फिर गाँधीवाद को  ठहरा रहे दोषी

गांधी गांधी नहीं वो तो एक धरम है
गांधी विरोधियों में भी ऐसी शरम है
कि बंद-कमरों में नफरत उगलने वाले
बाहिर गांधी के ही गले डाल रहे माले

गाँधी को मिटाने के हसरत वाले
सौ करोड़ हैं गाँधीवाद के रखवाले
गांधी के गुनाहगारों, देश शर्मिंदा है
गांधी हमारे दिल में सदैव जिंदा है

- अमिताभ रंजन 'प्रवासी'

Friday, October 4, 2019

मुक़म्मल मुक़र्रर

मुक़म्मल मुक़र्रर

मोहब्बत की तो बेइंतिहा मुक़म्मल
दिल टूटा तो कहा मुक़र्रर मुक़र्रर

दोस्ती की तो जी जान से मुक़म्मल
दुश्मनी की तो कहा मुक़र्रर मुक़र्रर

मेरे अल्फ़ाज़ हो मुक़म्मल मुक़म्मल
लिखा मिटाया लिखा मुक़र्रर मुक़र्रर

मुक़म्मल हर चीज़ हो यही आदत मेरी
मौत भी आई तो कहा मुक़र्रर मुक़र्रर

- अमिताभ रंजन झा 'प्रवासी'

Wednesday, October 2, 2019

राजनीति-कुंजी

राजनीति-कुंजी

राजनीति समझन में वक़्त न जाया कीजै
राजनीति-कुंजी ही बस आजमाया कीजै

विकास, रोजगार की बातें घुमा दांया-बांया कीजै
राष्ट्रवाद का घूँट पिला, गोरक्षा में लगाया कीजै

दिन में सात -आठ बार वस्त्र बदलया कीजै
टीवी, रेडियो, मोबाइल, होर्डिंग, अखबार में छाया कीजै

शहीदों कै बच्चों की शिक्षा में धन न लगाया कीजै
ओहि धन से शहीदों कै नाम भव्य आयोजन करवाया कीजै

निंदकों के कुटि को आंगन सहित जलाया कीजै
सीबीआई, आईटी, ईडी, ट्रोलआर्मी पीछे लगाया कीजै

पक्ष के भ्रष्टचारी बलात्कारी कै संत बताया कीजै
विरोधियों कै कर के नाश, मज़ाक उड़ाया कीजै

संविधान के बुझ कर, खेलते जाया कीजै
एक एक अनुच्छेद से लाभ कमाया कीजै

एक अस्थायी अनुच्छेद से अपनी जाति मिलाया कीजै
दूसरे अस्थायी अनुच्छेद कै झटके में मिटाया कीजै

स्थानीय नेता कै जेल हवा खिलाया कीजै
शांति आड़ मैं पूरे 'राज्य' करफ्यू लगाया कीजै

एक सम्पूर्ण देश कै आतंकी बताया कीजै
उग्रवाद के आरोपी कै एमपी बनाया कीजै

इतने से न रुकिए, आगे दूर तक जाया कीजै
'दक्षिण' लगा कै कर्फ्यू, हिंदी राष्ट्रभाषा बनाया कीजै

पांच डेग जग नाप कै नाम कमाया कीजै
'देश' लगा कै कर्फ्यू, अस्थायी आरक्षण हटाया कीजै

नीच कोई जो कहिहै, जाती कार्ड खेलाया कीजै
अपनी चुपड़ी बातन से सबके खूब नचाया कीजै

राजनीति-कुंजी की भाव महिमा कहत है तुच्छ प्रवासी
नित्य जो पाठ-अनुकरण करैं, जग बनिहैं ओकरी दासी

अमिताभ रंजन झा 'प्रवासी'

#pravasi #प्रवासी #प्रवासीसंग्रह #राजनीति #राजनीतिक_व्यंग

Tuesday, October 1, 2019

भूख

भूख

पत्थर दिल भी
देख मंजर पिघल गया

भूख थी जिसे
भूख ने ही निगल लिया

बेघर था जो
खुदा के घर निकल लिया

माटी का जो बना
मिट्टी में मिल गया

जीने को उसका जी
फिर मचल गया

वो उसी मिट्टी में
फूल बन के खिल गया

अमिताभ रंजन झा 'प्रवासी'

Monday, September 30, 2019

पानी-पानी

पानी-पानी

सवाल एक है आज सबकी ज़ुबानी
नेता और बाबू कब होंगे पानी-पानी?
वो नहीं हुए, हुआ शहर पानी-पानी
नेता और बाबू कब होंगे पानी-पानी?

रेहड़ी वालों के मेहनत पे फिरा पानी
नेता और बाबू कब होंगे पानी-पानी?
ठेले वालों के आंखों में भरा पानी
नेता और बाबू कब होंगे पानी-पानी?

हुए बाढ़ से हालात, राहत-कोष की बरसात
नेता और बाबू के मुँह भर गया पानी!
रहने दो छोड़ो, सवाल ये बचकानी
नेता और बाबू कभी हुए हैं पानी-पानी?

देख नेता और बाबू का लहू हुआ पानी
सदमें में 'प्रवासी', मांगें चुल्लू भर पानी।

- अमिताभ रंजन झा 'प्रवासी'

Sunday, September 22, 2019

बेटी

सृष्टि का विकास चरम पे
अब बेटीयों का नाश हो
मनुष्यों का सर्वनाश हो
इस सृष्टि का विनाश हो

हे मूर्ख क्यूँ है नासमझ
क्यूँ नहीं इतनी समझ
सृष्टि का आधार है
बेटी से ही संसार है

शुक्राणु अंडाणु हैं विशेष
इनका जब हो समावेश
मातृ-गर्भ में होकर प्रवेश
जीवन का होता श्रीगणेश

शुक्राणु का तो कोष है
बैंक से मिल जाएगा
गर्भ तो विशेष है
ये कहाँ से लाएगा

बेटियां परम हर्ष हैं
जीवन का उत्कर्ष हैं
मान है, अभिमान हैं
ईश्वर का वरदान हैं

बेटियां बच जाएंगी
सृष्टि निखर जाएगी
बेटियां पढ़ जाएंगी
सृष्टि सँवर जाएगी

- अमिताभ रंजन झा 'प्रवासी'

Saturday, September 14, 2019

हिंदी मेरी प्यारी हिंदी

हिंदी मेरी प्यारी हिंदी
सदियों से हमारी हिंदी
जग में सबसे न्यारी हिंदी
संस्कृत की दुलारी हिंदी
सीखने में आसान हिंदी
करोड़ों की जबान हिंदी
साहित्य की खान हिंदी
लेखकों की जान हिंदी
माथे पे तेरे आँचल हिंदी
श्रृंगार तुम्हारा चाँद बिंदी
भावनाओं की बोल हिंदी
हमको है अनमोल हिंदी

- अमिताभ रंजन झा 'प्रवासी'