Wednesday, April 27, 2011

एनडीए के शातिर, यूपीए के अल्हड़!

वित्तीय जागरूकता शीर्षक पर 'रिच डैड पुउर डैड' पुस्तक पढ़ा था जिसमे अच्छे सीए, बैंकर और लोएर मित्रजनों के साथ संपर्क पर जोर दिया गया है.

यदि देश में हो रहे तात्कालिक घोटाले के मामलों पर ध्यान दिया जाये तो एनडीए इस बात को चरितार्थ करती नजर आती है. एनडीए के शातिर, यूपीए के अल्हड़ों से काफी आगे लगते हैं.

जहा राजा, कलमाड़ी, अली की काली करतूत पकड़ी जा रही है, वही बिहार में 11,412 कड़ोड़ घोटाला और कर्नाटक में भूमि घोटाले को आराम से पचाया जा रहा है. इसको कहते है संगत का असर, अच्छे संपर्क का परिणाम.

चमत्कार ताऊ चमत्कार.

धिक्कार है उनपर जो खाते हैं पर पचा नहीं पाते हैं. एक तरफ हाल ये है कि बुड़बक लोग इतना खा लेते हैं कि उलटी-दस्त सब खाया बाहर कर देती है. दूसरी तरफ लोग खाते भी खूब हैं, फिर धाकड़ मित्रजनों के द्वारा अविष्कृत पाचक से सब हजम भी कर जाते हैं.

दाग अच्छे होते हैं. ऐसी आजादी और कहा. कर लो दूनिया मुट्ठी में.

एक तरफ वो हैं जो बेचारे अपना काला मुंह छुपाने में लगे हैं. पर इनका दुर्भाग्य देखिये. मुंह जिस रुमाल से ढंकते हैं कमबख्त उसमे भी इतना छेद निकल आता है कि शायद चलनी उससे ज्यादा ढँक पाती.

दूसरी तरफ के कलाकार लोग रेशमी रुमाल गले में बांध कर चोरी और सीनाजोरी तो करते ही हैं साथ-साथ इतनी जोर-जोर से चोर-चोर चिल्लाते हैं कि ध्वनि तरंग से यूपीए के करमजलों के चेहरे पर रहे-सहे गुदरी रुमाल के भी चीथड़े उड़ जाते हैं.

सीखो भाई कुछ इन पारंगत महानुभावों से.

एक तरफ दुनिया के सबसे प्रभावशाली महिलायों में शामिल एक दुखियारी विधवा के श्वेत पल्लू के आँचल की छोड़ पकड़े लाचार भिष्मपितामः अपनी असमर्थता पर टेसू बहाते नजर आते हैं तो दूसरी तरफ जिन्ना स्तुतिगान के रचैता अपनी सेना के संग गिरेबान में झाँकने की बजाय चोर मचाये शोर रणनीति अपनाये हैं. सत्य है, अटैक इज द बेस्ट डिफेंस.

अब तक जेल, प्रताड़ना, कोर्ट, कचहरी इत्यादि सिर्फ जनता के लिए थी, पर अब ये लोग यहाँ भी अपनी पैठ बनाने लगे हैं. जेल के लोग भयभीत हैं कि ऐसा न हो कि इन्हें जो दाल-रोटी मिलती है वो भी इन नए मेहमानों के घोटालो का शिकार हो जाये. एक बार घोटाले कि लत लग जाती तो कुछ भी कही भी हो सकता है. सच है, जहा चाह वहा राह. आस्तिक तो आस्तिक, जेल के नास्तिक भी आँखें मूंद कर प्रार्थना कर रहे हैं, मनौती मांग रहे कि हे दीनानाथ, यहाँ तो भीड़ न बढ़ाये. हमारे कर्म, अकर्म और दुष्कर्म की ऐसी भयानक सजा न दे. त्राहिमाम. उनकी दुआ प्रभु एक पल सुनते है और घोटालेबाजो को बेल मिल जाती है. अब प्रभु को भी कुछ मानोरंजन चाहिए सो बेल के बाद फिर जेल फिर बेल का सिलसिला चलता रहता है. इसी कारण कोई राजनीतिज्ञ सलाखों के पीछे नहीं रहता, इतिहास भी इसी का गवाह है.

देश और देशवासियों कि हालत मत पूछिए.

व्यंग एक तरफ. देश को अब एक नयी पार्टी ही शायद बचा सकती हो जिसमें कलाम जैसे स्वच्छ छवि के सफल, अनुभवी मार्गदर्शक हो और पढ़े लिखे इमानदार कर्मठ युवावों की उर्जा हो.

इन सड़े-गले, पके-पकाए, थके-आजमाए लोगो पर और विश्वास करना फिजूल है.

साडी भड़ास निकल कर अब मन हल्का लग रहा है.

1 comment:

  1. hi amiatabh h r u?
    dis is awesome yaar kahan se aati hai yeh sab dimag me, congrate for ur blog...............

    ReplyDelete