जशन-ए-आज़ादी पे
है आज हसरत|
हो सख्त मेहनत
और मशक्कत||
गरीबी बदहाली को
दे जरा फुर्सत|
और अम्नोखुशहाली की
हो सदा बरकत||
ए मालिक कर इनायत,
बक्श हमें नेक किस्मत|
यार परिवार के संग मिल
तबियत से हो दावत||
नफरत और कड़वाहट हो
हमेशा के लिए रुखसत|
और वतन-ए-मोहब्बत में
शहादत की हो हिम्मत||
पड़ोसी के लिए थोड़ी
अक्ल की है चाहत|
दें दोस्ती का दस्तक,
प्यार की आहट||
काश वो बदले
अपनी बुरी फितरत|
और सियासत-ए-अमन की
करे इज्ज़त||
करे वो कसरत,
रखे लिहाज़-ए-इंसानियत|
छोड़े उसूल-ए-हुकूमत,
जो ढाए मासूमो पे क़यामत||
बंद करे वो उलटी-सीधी
हरकते निहायत|
वरना एक दिन लोग
करेंगे बगावत||
पर याद ये
बात रहे हजरत|
न हो कोई
गुस्ताख हिमाकत||
गर लड़ाई की
कभी हुई जुर्रत|
खाक होगी
बेशक तेरी किस्मत||
अमन पसंद हैं हम,
करे इसकी वकालत|
लड़ाई नहीं रही
कभी हमारी चाहत||
सबके लिए हो
पैगाम-ए-सदाकत|
जशन-ए-आज़ादी पे
है आज ये हसरत||
- अमिताभ रंजन झा
Saturday, August 14, 2010
जशन-ए-आज़ादी
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आपकी शब्द रचनाएँ अति सुन्दर और भावपूर्ण है| शब्दोंकी जगह अति सुन्दर| बहुत बहुत आभार इस सुन्दर प्रविष्टि के लिए शुभकामनाओं के साथ,
ReplyDeleteमोहिनी
धन्यवाद!
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