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I am also on YourQuote
I am also on YourQuoteसरफ़रोशी
फिर सिरफिरों में वही है सरगोशी
फिर सरफ़रोशों की है सरफ़रोशी
फिर गांधीके शहादत सी ख़ामोशी
फिर गाँधीवाद को ठहरा रहे दोषी
गांधी गांधी नहीं वो तो एक धरम है
गांधी विरोधियों में भी ऐसी शरम है
कि बंद-कमरों में नफरत उगलने वाले
बाहिर गांधी के ही गले डाल रहे माले
गाँधी को मिटाने के हसरत वाले
सौ करोड़ हैं गाँधीवाद के रखवाले
गांधी के गुनाहगारों, देश शर्मिंदा है
गांधी हमारे दिल में सदैव जिंदा है
- अमिताभ रंजन 'प्रवासी'
मुक़म्मल मुक़र्रर
मोहब्बत की तो बेइंतिहा मुक़म्मल
दिल टूटा तो कहा मुक़र्रर मुक़र्रर
दोस्ती की तो जी जान से मुक़म्मल
दुश्मनी की तो कहा मुक़र्रर मुक़र्रर
मेरे अल्फ़ाज़ हो मुक़म्मल मुक़म्मल
लिखा मिटाया लिखा मुक़र्रर मुक़र्रर
मुक़म्मल हर चीज़ हो यही आदत मेरी
मौत भी आई तो कहा मुक़र्रर मुक़र्रर
- अमिताभ रंजन झा 'प्रवासी'
राजनीति-कुंजी
राजनीति समझन में वक़्त न जाया कीजै
राजनीति-कुंजी ही बस आजमाया कीजै
विकास, रोजगार की बातें घुमा दांया-बांया कीजै
राष्ट्रवाद का घूँट पिला, गोरक्षा में लगाया कीजै
दिन में सात -आठ बार वस्त्र बदलया कीजै
टीवी, रेडियो, मोबाइल, होर्डिंग, अखबार में छाया कीजै
शहीदों कै बच्चों की शिक्षा में धन न लगाया कीजै
ओहि धन से शहीदों कै नाम भव्य आयोजन करवाया कीजै
निंदकों के कुटि को आंगन सहित जलाया कीजै
सीबीआई, आईटी, ईडी, ट्रोलआर्मी पीछे लगाया कीजै
पक्ष के भ्रष्टचारी बलात्कारी कै संत बताया कीजै
विरोधियों कै कर के नाश, मज़ाक उड़ाया कीजै
संविधान के बुझ कर, खेलते जाया कीजै
एक एक अनुच्छेद से लाभ कमाया कीजै
एक अस्थायी अनुच्छेद से अपनी जाति मिलाया कीजै
दूसरे अस्थायी अनुच्छेद कै झटके में मिटाया कीजै
स्थानीय नेता कै जेल हवा खिलाया कीजै
शांति आड़ मैं पूरे 'राज्य' करफ्यू लगाया कीजै
एक सम्पूर्ण देश कै आतंकी बताया कीजै
उग्रवाद के आरोपी कै एमपी बनाया कीजै
इतने से न रुकिए, आगे दूर तक जाया कीजै
'दक्षिण' लगा कै कर्फ्यू, हिंदी राष्ट्रभाषा बनाया कीजै
पांच डेग जग नाप कै नाम कमाया कीजै
'देश' लगा कै कर्फ्यू, अस्थायी आरक्षण हटाया कीजै
नीच कोई जो कहिहै, जाती कार्ड खेलाया कीजै
अपनी चुपड़ी बातन से सबके खूब नचाया कीजै
राजनीति-कुंजी की भाव महिमा कहत है तुच्छ प्रवासी
नित्य जो पाठ-अनुकरण करैं, जग बनिहैं ओकरी दासी
अमिताभ रंजन झा 'प्रवासी'
#pravasi #प्रवासी #प्रवासीसंग्रह #राजनीति #राजनीतिक_व्यंग
भूख
पत्थर दिल भी
देख मंजर पिघल गया
भूख थी जिसे
भूख ने ही निगल लिया
बेघर था जो
खुदा के घर निकल लिया
माटी का जो बना
मिट्टी में मिल गया
जीने को उसका जी
फिर मचल गया
वो उसी मिट्टी में
फूल बन के खिल गया
अमिताभ रंजन झा 'प्रवासी'
पानी-पानी
सवाल एक है आज सबकी ज़ुबानी
नेता और बाबू कब होंगे पानी-पानी?
वो नहीं हुए, हुआ शहर पानी-पानी
नेता और बाबू कब होंगे पानी-पानी?
रेहड़ी वालों के मेहनत पे फिरा पानी
नेता और बाबू कब होंगे पानी-पानी?
ठेले वालों के आंखों में भरा पानी
नेता और बाबू कब होंगे पानी-पानी?
हुए बाढ़ से हालात, राहत-कोष की बरसात
नेता और बाबू के मुँह भर गया पानी!
रहने दो छोड़ो, सवाल ये बचकानी
नेता और बाबू कभी हुए हैं पानी-पानी?
देख नेता और बाबू का लहू हुआ पानी
सदमें में 'प्रवासी', मांगें चुल्लू भर पानी।
- अमिताभ रंजन झा 'प्रवासी'
सृष्टि का विकास चरम पे
अब बेटीयों का नाश हो
मनुष्यों का सर्वनाश हो
इस सृष्टि का विनाश हो
हे मूर्ख क्यूँ है नासमझ
क्यूँ नहीं इतनी समझ
सृष्टि का आधार है
बेटी से ही संसार है
शुक्राणु अंडाणु हैं विशेष
इनका जब हो समावेश
मातृ-गर्भ में होकर प्रवेश
जीवन का होता श्रीगणेश
शुक्राणु का तो कोष है
बैंक से मिल जाएगा
गर्भ तो विशेष है
ये कहाँ से लाएगा
बेटियां परम हर्ष हैं
जीवन का उत्कर्ष हैं
मान है, अभिमान हैं
ईश्वर का वरदान हैं
बेटियां बच जाएंगी
सृष्टि निखर जाएगी
बेटियां पढ़ जाएंगी
सृष्टि सँवर जाएगी
- अमिताभ रंजन झा 'प्रवासी'
हिंदी मेरी प्यारी हिंदी
सदियों से हमारी हिंदी
जग में सबसे न्यारी हिंदी
संस्कृत की दुलारी हिंदी
सीखने में आसान हिंदी
करोड़ों की जबान हिंदी
साहित्य की खान हिंदी
लेखकों की जान हिंदी
माथे पे तेरे आँचल हिंदी
श्रृंगार तुम्हारा चाँद बिंदी
भावनाओं की बोल हिंदी
हमको है अनमोल हिंदी
- अमिताभ रंजन झा 'प्रवासी'
पिंजड़े में बड़ा सा पंछी
कमजोर अधमरा सा पंछी
भविष्य से अनजान था
पल भर का वो मेहमान था
एक दिन बुलंद कर हौसला
क़ैद से बस उड़ चला
देख के उड़ान उसकी
एक नई पहचान उसकी
दुनिया ये ठिगनी हो गयी
आसमां भी कम पड़ गया
अमिताभ रंजन झा 'प्रवासी'
बारिश की एक बूंद माटी पे जा गिरी
बारिश की वो बूंद माटी से मिल गयी
बारिश की एक बूंद पत्थर पे जा गिरी
बारिश की वो बूंद टूट के बिखर गयी
तुझसे इश्क़ का अंजाम ऐसा हो गया
पहले तो मैं टूटा और पूरा बिखर गया
सोच के शायद ये अंजाम कम हो गया
मैं जोर से कूदा जा मिट्टी में मिल गया
- अमिताभ रंजन झा 'प्रवासी'