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Sunday, March 14, 2010

फिर याद आया कोई

फिर याद आया कोई
हुयी आँखें फिर से नम|
फिर दिल में वही टीस
उठी फिर से वही चुभन||

अक्सर मैं सोचता हूँ
हाय कैसे मेरे करम|
या खुदा तू जवाब दे
क्यों ढाया ये सितम||

यूँ तो छोर मैं चला
वो गलियां वो वतन|
लेकिन ये यकीं है
वो याद आयेंगे हरदम||

फिर आँखों में दिख रहे
वो पल साथ थे जो हम|
यूँ संग तो वो नहीं
पर चाहत ना हुयी कम||

फिर याद आया कोई
हुयी आँखें फिर से नम|
फिर दिल में वही टीस
उठी फिर से वही चुभन||

- अमिताभ रंजन झा

Friday, August 1, 2008

A poem for my short-lived son Adbhut

A poem for my short-lived son Adbhut.

अदभुत

छोटे से अदभुत को
दी तुमने कितनी पीड़ा|
मासूमों के जीवन से क्यों
करते हो तुम क्रीड़ा?

एक बूंद भी दुग्ध का
ना तुमने उसे चखाया|
दी चौंतीस दिनों की आयु
और पल पल उसे तड़पाया||

पुत्र मोह में डूबा मैं
करता रहा पुकार|
पुत्र शोक का तुमने
दिया मुझे उपहार||

पुत्र के आलिंगन की
मैं करता रहा प्रतिक्षा|
किन्तु उसके प्राणों की
तुमने की ना रक्षा||

बिलख बिलख के रोया मैं
किया पुत्र को अंतिम प्यार|
कटु निर्णय तेरा प्रभु
करना था स्वीकार||

निर्मल हृदय गंगा का
कितना है विशाल|
माता, पुत्री के पश्चात्
लिया पुत्र को मेरे संभाल||

अपने हाथों पुत्र को मैंने
गंगा गर्भ में समाया|
ना कही धरती फटी
न कोई प्रलय ही आया||

विनती करू मैं तुमसे
सुन ले मेरे नाथ|
किसी पिता को जग में
मिले ना ये अभिशाप||

कष्ट और आंशु का
ना दुनिया में हो निशान|
भर दे सबकी झोली
मांगू यही वरदान||

- अमिताभ रंजन झा