Wednesday, January 5, 2011

परिचय/Introduction

जर्मनी में बसा हूँ, हिंदी में लिखना शौक, सोर्स कोड लिखना पेशा!


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The Canal Proposal

500Km Canal Proposal on Nepal border in Bihar to solve flood problem and bring Agricultural Industrial Revolution
Canal on Bihar-Nepal border will control flood, produce electricity & revive agriculture and industry! A Common Dream A Prosperous Bihar

A journey from Mithila to Germany









Introduction:

I am from a small village named Seema near Madhubani in Bihar. I was born in my mother's village called Gandhabari near Pandaul in Madhubani. I was born on a bullock cart while on the way to hospital. :) Yes, that is true! But I wonder if there is a drastic change in the healthcare facilities there even after decades gone. I was brought up in Patna. I am an IT Professional and an MBA. I worked in Bangalore and currently I am in Germany. I have been fortunate to travel to many places in world like Malaysia, Taiwan, Europe and extensively in USA. But I have dream to settle in Seema. But not in the Seema of today. Rather Seema and every village of tomorrow, where there will be non-stop electricity, fast internet, abundance of employment opportunities, quality hospital, school and roads. I dream that our children will have option to live in the heart of the motherland unlikely from us who are forced to migrate for education or jobs. Health, wealth and harmony for each and every individual! Sane or insane, stupid or smart, that is what I dream.


मैं बिहार के एक छोटे से खुबसूरत और हरे-भरे गांव से हूँ. मेरा जन्म मेरे ननिहाल में हुआ था. मुझे बताया गया कि हस्पताल जाते वक्त रास्ते में ही बैलगाड़ी में मेरा जन्म हो गया, गांव में हस्पताल नहीं था. बहुत लोग ये सुन कर हँसते हैं, पर ये सत्य है. हालाँकि हास्यास्पद बात ये है कि 3 दशक से ज्यादा समय बीत जाने के बाद भी वहा कुछ ज्यादा बदलाव नहीं आया है. आज 30 वर्षों के बाद भी क्या मेरे गांव में मूलभूत सुविधायों में परिवर्तन आया है? सोचने का विषय है. ये हालत लगभग हर गांव की है.

बाबा खेतिहर थे, इलाके में नाम था. शायद कृषक के कठोर जीवन से सबक लेकर, उन्होंने अपने बच्चों को उन्होंने खूब पढाया. पिताजी की नौकरी लगी और हम १९८० के आसपास समस्तीपुर आ गए. पर हर छोटे बड़े त्यौहार जैसे मकड़ संक्रांति, होली, चौठ चन्द्र, अनंत पूजा, दशहरा, कोजगरा, दीवाली, छठ, छुट्टिया, शादी, मुंडन, उपनयन में हम गांव जाते रहे. फिर पिताजी का तबादला पटना हो गया. जैसे जैसे गांव से दूरी बढ़ती हमारा गांव जाना धीरे धीरे कम होता गया.

पटना से मेट्रिक किया फिर आई आई टी और बी आई टी की तय्यारी में वर्षों तक लगा रहा किन्तु सफलता हाथ नहीं लगी. बहुत ठोकरे खाई. 2000 में एक किताब पढ़ी शिव खेरा की, "यू कैन विन". किताब का पहला पृष्ठ मन में बैठ गया "गुब्बारे का बाहर का रंग नहीं, उसके अंदर की बात उसको ऊपर ले जाती है". अच्छी किताब है, जब मौका मिले जरुर पढ़िए. मैनेजमेंट में स्नातकोत्तर डिप्लोमा ली, छोटी मोटी नौकरी की, फिर बंगलोर आ गया. नौकरी के लिए बैंगलोर की गलियों की खाक छानी और धीरे धीरे आगे बढ़ता गया और आज ठीक ठाक स्तिथि में हूँ एक आई टी प्रोफेसनल के रूप में.

नौकरी ने आधी दुनिया देखने का मौका दिया, अमेरिका, मलेसिया, ताइवान और यूरोप. मेनेजर बुला के पूछते ऑनसाईट जाओगे, कोई समस्या तो नहीं है? मैं हमेशा ये सोचता कि जब घर में नहीं हूं तो दुनिया के किसी भी कोने में हूँ क्या फर्क पड़ता है? चलो फिर. आज कल जर्मनी में हूँ और जब भी मौका मिलता है निकल पड़ता हू यूरोप कि सैर पर.

माँ इलाहाबाद में पली-बढी थीं, हिंदी में लिखने का शौक था और काफी अच्छा लिखती थीं. हिंदी की चलती फिरती शब्दकोष थीं वो, मेरी हिंदी गयी गुजरी है, हिंगलिश का आदि हो गया हूँ. अक्सर उन्हें लिखते देखता था, कहानी, कविताऐं. सो लिखने का शौक मुझे विरासत में मिला है. शायद पांचवे या छठे कक्षा में था और मैंने एक व्यंग लिखी थी, मेरी पहली कृति. माँ हँसते हँसते लोट-पोट हो गयी थीं, बोली अच्छा है, लिखते रहो. वो कहानी नहीं है मेरे पास, शायद भूल से सोनपापड़ी या कबाड़ी वाले को दे दिया होगा. हालाँकि आधा सीधा याद प्रसंग है. 

India Against Corruption से जुड़ा हुआ था। फिर 2014/15 में बीजेपी के चुनाव प्रचार में OFBJP के साथ तन मन धन से काम किया था, बिहार ऐलेक्सन में 1 महीने छुट्टी लेकर बीजेपी का प्रचार किया था और पटना में नवसारी एम पी श्री C R पाटिल जो कि अमित शाह के करीबी हैं उनसे जुड़ा था। पर तब और अब में अंतर है। तब सबका साथ सबका विकास मुद्दा था। लगातार हो रही त्रुटियां, विकास से भटकाव को समर्थन कैसे करता? दिल टूट गया। IAC राजनीति में AAP बन के उतरी। शुरू में बहुत साथ दिया, पर वो आपस मे ही लड़ने लगे। तब भी दिल टूटा था। निस्वार्थ तन मन धन अर्पण करो और ये परिणाम?

भारत से जुड़ा हुआ हूँ और अब भी भारतीय नागरिक हूँ। जर्मनी कैरियर और भविष्य के लिए चला आया। यहाँ काम करने में, अनुसंधान, अविष्कार, संभावना में ज्यादा ऑप्शन हैं। भारत में अनुभवी IT professional के लिए संभावनाएं कम होती जाती हैं। माइंडसेट है कि, 2 साल अनुभव वाला वही काम कर सकता है तो 20 साल वालों को ज्यादा सैलरी दे क्यों रखे। यहां रिटायरमेंट उम्र 68 है, healthcare subsidized है, प्रदूषण निम्मनतम है, इंफ्रास्ट्रक्चर उत्तम है, लोग नियम पसंद हैं, समय की कद्र है। पर यहां अपना कल्चर, माँ, पिता, भाई, बहन, नाते, रिश्तेदार, दोस्त, लोग, अपना त्योहार खान पान से दूरी होती जाती हैं। यहाँ काम वाली, ड्राइवर, नौकर यहां की मिडिल क्लास अफोर्ड नहीं कर सकती। साल में 6 महीने ठंड अलग। कुछ पाने के लिए कुछ खोना पड़ता है। पर यहां रहने से फाइनेंसियल स्तिथि बेहतर होती गयी। इसी कारण पटना में और गांव में स्कूल और कंप्यूटर ट्रेनिंग खोला था, 2 साल लोगों की सेवा करने की कोशिश की। बिहार उद्यमी संघ का मेंबर बना। कंपनी बनाया। अपना विज़न और मिशन CM के अध्यक्षता में 500 से 1000 लोगों के सामने पर प्रेजेंट किया। सरकारी ज़मीन के लिए चक्कर लगाता रहा। पर अंततः परिणाम शून्य। बिहार सरकार एवम प्रशासन ब्रोकर के हाथों में हैं। सारी जमा पूंजी तो गयी ही, करोड़ों का लोन हो गया। खैर, देश के लिए लगा रहूंगा।

किन्तु दुनिया में कही भी हूं, गांव-देस की याद हमेशा आती है. अपने गांव में बसना चाहता हूं. थोड़ा स्वार्थी और आराम तलब हो गया हूं। इसलिए आज के गांव में नहीं बल्कि उस गांव में बसना चाहता हूं जहा निरंतर बिजली हो, द्रुत इन्टरनेट सुविधा हो, प्रचुर नौकरिया हो, अच्छे अस्पताल हों, विद्यालय हों, सड़के हों, सभी स्वस्थ हों, समृद्ध हों. ऐसी कल्पना भारत के हर गांव के लिए है. और ऐसा मुश्किल नहीं है, क्योंकि मैं ये बाते जर्मनी में एक छोटे से समृद्ध गांव में बैठ कर लिख रहा हूं. और आशा करता हूं कि ये अपने जीवन में देख सकूँगा. और उन सपनों को साकार करने के लिए बिहार रीभाईभल फोरम (http://revive-bihar.blogspot.com) के माध्यम से प्रयत्नशील हूँ.

Saturday, January 1, 2011

सूरत और सीरत

आँखें फाड़ शीशे को
देखते रहते हो,
कभी शरमाते
कभी घबराते
तो कभी मुस्कराते हो|
आँखें बंद कर कभी
अंदर भी निहारों||

सूरत सँवारने में
घंटे लगे रहते हो,
क्या क्या लगा के
न जाने सजते हो
सँवरते हो|
कभी सीरत को भी
तो तराशो निखारो||

- अमिताभ रंजन झा

Friday, December 31, 2010

नववर्ष का स्वागत

बीता ये साल,
छोड़े सब मलाल,
नववर्ष के स्वागत
में आ झूमे गायें|

नंगे है तन,
भूखे है जन,
पर उम्मीद का दिया
कभी बुझने न पाए|

लाखो हो मुश्किलें,
मिल के हम चले,
सपनो का वतन
मेहनत से बनाये|

आ ले ये कसम,
जब तक दम में दम,
भारत का तिरंगा
झुकने न पाए|

हौसला रहे अटल,
हर प्रयास हो सफल,
नव वर्ष में सबको
हार्दिक शुभकामनाएं|

- अमिताभ रंजन झा

Sunday, December 19, 2010

God bless Germany!

In the freezing cold,
inside the blanket of snow,
in the arms of nature
moves on Germany!

Sun rises late,
night comes early,
against all odds
never stops Germany!

In the season of summer,
morning arrives too early,
and moon rises too late
but never complains Germany!

The destruction in the world war
could not break courage.
Through hard work and integrity
raised again Germany!

Agony or joy in life
or comfort or challenges,
we must move on
teaches us Germany!

From a factory in America
to a small village in India,
in every corner of the world
you will find technology Germany!

Things happen on the press of button,
Life made easy by science and wisdom,
Abundant development and happiness,
God bless Germany!

People are honest and truthful,
there is no place for crime,
hard work is the identity,
Salute you Germany!

- Amitabh Jha

सौ सौ नमन जर्मनी

हिमपात एवं भीषण शर्दी यूरोप के जीवन को कितना कठिन बना देती है, अंदाज नहीं था। छह महीने ठण्ड, बर्फ और अन्धकार में डूबे रहने के बाबजूद यहाँ के लोगो ने इतनी तरक्की की है। इनसे सीख मिलती है कि कठिनाइयों का समाधान करो और आगे बढ़ो। एक कविता इनको समर्पित।

करकराती सर्द में,
बर्फीली चादर तले,
प्रकृति की आगोश में,
चलती रहे जर्मनी!

सूरज देर से जगे,
रात जल्द आये तो क्या?
किसी भी हाल में कभी
रूकती नहीं जर्मनी!

गर्मी के मौसम में
जल्द आ टपके सवेरा,
चाँद लेट लतीफ़ तो क्या?
शिकायत करती नहीं जर्मनी!

युद्ध ने था लुटा कभी,
पर हौसला न टूटा कभी!
कड़ी मेहनत और लगन से
फिर से उठी जर्मनी!

जीवन में ग़म हो या ख़ुशी,
आसान हो या मुश्किले,
बढ़ते रहे हम सदा
सिखाती हमे जर्मनी!

अमेरिका के उद्योग में,
भारत के छोटे गाँव में,
दुनिया के कोने कोने में,
दिखती है तकनीक जर्मनी!

बटन दबाके हो हर काम,
ज्ञान-विज्ञान से जीवन आसान,
छाई विकास,ऐश्वर्य और ख़ुशी,
यूँही सदा रहे जर्मनी!

लोग सीधे और सच्चे,
अपराध का निशां नहीं,
मेहनत यहाँ पहचान है
सौ सौ नमन जर्मनी!

- अमिताभ रंजन झा

Saturday, November 20, 2010

हाड़ मांस का पुतला

ऐश्वर्या कैसे एक वर्ष की हो गयी कुछ पता ही नहीं लगा
इन बारह महीनो के अनुभव के आधार मेरे जीवन के पहले साल को व्यक्त करने की कोशिश

*************************

मै जग में जब आया
अपने साथ क्या लाया होगा?
हाड़ मांस का पुतला बस
और अकल जरा न पाया होगा!

मात्रु-गर्भ में नौ महीने
निश्चिन्ता से बिताया होगा!
कभी पलट कभी लात मार कर
माँ को बहुत सताया होगा!

प्रसव-पीड़ा की घड़ी में बेशक
माँ को बहुत रुलाया होगा!
ऑंखें भींच, मुट्ठी बाँध रो
आगमन-बिगुल बजाया होगा!

माँ ने अपने वक्ष लगा के
दुग्धपान मुझे सिखाया होगा!
दिन-रात सीने से लगा के
लोरी गान सुनाया होगा!

पिता ने अपने गले लगा के
आँगन गली घुमाया होगा!
दादा-दादी और सब लोगो ने
जी भर स्नेह लुटाया होगा!

पवन मल-मूत्र, थूक-लाड़ से मैंने
परिजनों को बहुत भिंगाया होगा!
जब मर्जी हो मैं खुद सोया
पर सबको हर रात जगाया होगा!

इसी लिए शायद सबने मुझको
सुई-टिका लगवाया होगा!
बदले में ताप और दर्द से
मैंने सबका चैन चुराया होगा!

तीन माह जब होने को होंगे
पहली किलकारी लगायी होगी!
उसी माह में लगता है
पहली बार बुदबुदाया होगा!

पांच माह में शायद
पहली करवट बदली होगी!
सात माह में चल घुटनों पर
सबको नाच नचाया होगा!

नवमे माह में दांत काट सभीको
नानी याद दिलाया होगा!
१२ माह में भाग भाग कर
घर को सर पे उठाया होगा!

मै जग में जब आया
अपने साथ क्या लाया होगा?
हाड़ मांस का पुतला बस
और अकल जरा न पाया होगा!

- अमिताभ रंजन झा

Poems dedicated to mother:

माँ मुझको कलेजे से लगाये रखना

माँ तू याद आती है

आंतकवादी की माँ

Friday, November 5, 2010

Happy deepavali! दीपावली की हार्दिक शुभकामना!


Dear friends,


Happy deepavali! दीपावली की हार्दिक शुभकामना!


May mother Lakshmi bless all with abundant of wisdom, health, wealth and harmony!

All we need is hope, courage and action to to make all our wish come true!

God bless Bihar!
God bless India!
God bless the world!


Warm regards,

Amitabh Jha
BRF

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Tuesday, October 19, 2010

चाँद बेदाग

सुनहरी आग तू
चाँद बेदाग तू
सफ़ेद मेहताब तू
इश्क बेहिसाब तू|

उभरता शवाब तू
हुस्न लाजवाब तू
हसीन रुवाब तू
नशीली शराब तू|

एक पाक किताब तू
सुबह का आफताब तू
वजह ए बेताब तू
मेरी मन्नत का जवाब तू|

दुनिया के लिए ऐतराज तू
मेरी जन्नत का रिवाज तू
ज़माने के जले पर तेजाब तू
पर मेरे हर मर्ज का इलाज तू|

मेरी गुलाब तू
मेरी नाज तू
मेरी हमनवाज़ तू
मेरी हमराज तू|

मेरे आँखों का हिजाब तू
मेरे होठों का रियाज तू
मेरी दिल की आवाज तू
मेरी हसीन ख्वाब तू|

- अमिताभ रंजन झा

Saturday, October 9, 2010

आसमान के पंछी चंचल

India is on fast track of success and the credit goes to the hard work of the infinite daughters and sons of the soil. This poem is dedicated to each and every Indian!

ओढ़ने को ले एक कम्बल
खाने को कुछ फुल और फल|
आगे बढते रहते हर पल
बदल रहे वो भारत की शकल||

जीवन उनका संघर्ष का जंगल
पग पग रखते संभल संभल|
जब ये दिखाए ताकत और अकल
दुनिया झाकें अगल और बगल||

जैसे जैसे होते वो सफल
होता जाता ऊँचा मनोबल|
बढ़ता जाता उनका आत्मबल
जैसे बहती झरना कलकल||

और कभी जो होते विफल
न मन को होने देते दुर्बल|
यदि कभी जो होते विकल
नहीं गिराते आँखों से जल||

नींद से जब होता तन बोझल
और थकान जब रहता मसल|
जहा कोई हो घना सा पीपल
वही लेट जाते दल बदल||

कंधे पर ले भारत का हल
पीते जाते घातक हलाहल|
नहीं सोचते कल आज कल
रोपते जाते अनगिनत फसल||

आसमान के पंछी चंचल
उड़ते ऊँचा चीर के बादल|
भरते जाते मातृभूमि का आँचल
करते जाते जन्भूमि का मंगल||

- अमिताभ रंजन झा

Thursday, September 30, 2010

आत्मरक्षितो परमोधर्मः

Hinduism says:
आत्मरक्षितो परमोधर्मः| - Self-protection is duty!

The question is "What is SELF"?

Here is the answer.

Hinduism also says:
वसुधैव कुटुम्बकम| - All living on Earth are friends!

The scope of SELF can be as big as your heart and your thoughts!

Self-protection is Compulsion,
all living on Earth are relation|
Let's have self determination
to protect our nation||

Protect your self
Protect your family
Protect your friends
Protect you loved ones|

Protect your vicinity
Protect your common property
Protect your city
Protect serene humanity|

Protect your country
Protect your state
Protect your Earth
Protect your Universe|
- Amitabh Jha

Be a SANE INSAN not an INSANE SATAN!

God bless India|