Tuesday, October 1, 2019

भूख

भूख

पत्थर दिल भी
देख मंजर पिघल गया

भूख थी जिसे
भूख ने ही निगल लिया

बेघर था जो
खुदा के घर निकल लिया

माटी का जो बना
मिट्टी में मिल गया

जीने को उसका जी
फिर मचल गया

वो उसी मिट्टी में
फूल बन के खिल गया

अमिताभ रंजन झा 'प्रवासी'

Monday, September 30, 2019

पानी-पानी

पानी-पानी

सवाल एक है आज सबकी ज़ुबानी
नेता और बाबू कब होंगे पानी-पानी?
वो नहीं हुए, हुआ शहर पानी-पानी
नेता और बाबू कब होंगे पानी-पानी?

रेहड़ी वालों के मेहनत पे फिरा पानी
नेता और बाबू कब होंगे पानी-पानी?
ठेले वालों के आंखों में भरा पानी
नेता और बाबू कब होंगे पानी-पानी?

हुए बाढ़ से हालात, राहत-कोष की बरसात
नेता और बाबू के मुँह भर गया पानी!
रहने दो छोड़ो, सवाल ये बचकानी
नेता और बाबू कभी हुए हैं पानी-पानी?

देख नेता और बाबू का लहू हुआ पानी
सदमें में 'प्रवासी', मांगें चुल्लू भर पानी।

- अमिताभ रंजन झा 'प्रवासी'

Sunday, September 22, 2019

बेटी

सृष्टि का विकास चरम पे
अब बेटीयों का नाश हो
मनुष्यों का सर्वनाश हो
इस सृष्टि का विनाश हो

हे मूर्ख क्यूँ है नासमझ
क्यूँ नहीं इतनी समझ
सृष्टि का आधार है
बेटी से ही संसार है

शुक्राणु अंडाणु हैं विशेष
इनका जब हो समावेश
मातृ-गर्भ में होकर प्रवेश
जीवन का होता श्रीगणेश

शुक्राणु का तो कोष है
बैंक से मिल जाएगा
गर्भ तो विशेष है
ये कहाँ से लाएगा

बेटियां परम हर्ष हैं
जीवन का उत्कर्ष हैं
मान है, अभिमान हैं
ईश्वर का वरदान हैं

बेटियां बच जाएंगी
सृष्टि निखर जाएगी
बेटियां पढ़ जाएंगी
सृष्टि सँवर जाएगी

- अमिताभ रंजन झा 'प्रवासी'

Saturday, September 14, 2019

हिंदी मेरी प्यारी हिंदी

हिंदी मेरी प्यारी हिंदी
सदियों से हमारी हिंदी
जग में सबसे न्यारी हिंदी
संस्कृत की दुलारी हिंदी
सीखने में आसान हिंदी
करोड़ों की जबान हिंदी
साहित्य की खान हिंदी
लेखकों की जान हिंदी
माथे पे तेरे आँचल हिंदी
श्रृंगार तुम्हारा चाँद बिंदी
भावनाओं की बोल हिंदी
हमको है अनमोल हिंदी

- अमिताभ रंजन झा 'प्रवासी'

Tuesday, September 10, 2019

हौसला

पिंजड़े में बड़ा सा पंछी
कमजोर अधमरा सा पंछी
भविष्य से अनजान था
पल भर का वो मेहमान था
एक दिन बुलंद कर हौसला
क़ैद से बस उड़ चला
देख के उड़ान उसकी
एक नई पहचान उसकी
दुनिया ये ठिगनी हो गयी
आसमां भी कम पड़ गया

अमिताभ रंजन झा 'प्रवासी'

बारिश की बूंद

बारिश की एक बूंद माटी पे जा गिरी
बारिश की वो बूंद माटी से मिल गयी
बारिश की एक बूंद पत्थर पे जा गिरी
बारिश की वो बूंद टूट के बिखर गयी

तुझसे इश्क़ का अंजाम ऐसा हो गया
पहले तो मैं टूटा और पूरा बिखर गया
सोच के शायद ये अंजाम कम हो गया
मैं जोर से कूदा जा मिट्टी में मिल गया

- अमिताभ रंजन झा 'प्रवासी'

Tuesday, September 3, 2019

अभिलाषा

लड़की हूँ या कोई पाप
प्रश्न बड़ा सा है।
बाहर निकलू घूरे दुनिया
ये कैसी भाषा है?

लड़की बस घर का काम करें
ये कैसी आशा है?
कैसे जिऊ अपनी मर्जी से
मन में निराशा है?

तुझको मुझको सबको
प्रभु ने तराशा है।
फिर भेद भाव ये कैसा है
ये क्या तमाशा है?

एक दिन बदले ये दुनिया
मुझको भरोसा है।
हो लड़का लड़की एक समान
मेरी अभिलाषा है।

- अमिताभ रंजन झा

Monday, September 2, 2019

खामोशी

तेरी खामोशी को हाँ समझू या कि ना समझू
यही सोच सोच कर मैं परेशान हुआ जाता हूँ।

तुझे देखु तो गुस्सा और ना देखु तो भी गुस्सा
तेरी नाजों अदाओं पे  मैं हैरान हुआ जाता हूँ।

रुकने को नही कहती जाने को नहीं कहती हो
तेरी बेरुखी पे तो हाय मैं कुर्बान हुआ जाता हूँ।

दिलों जान जिगर से चाहा  है  मैंने हमेशा तुमको
तुम मुमताज हो न हो मैं शाहजहां हुआ जाता हूँ।

- अमिताभ रंजन झा

Friday, September 29, 2017

पोन ठेलवा

कहानी प्रस्तुत है ... शीर्षक है.... पोन ठेलवा
एक देश में एक नेता हैं। वो 2014 चुनाव में राष्ट्रीय लहर में भी बुरी तरह हार गए...
फिर भी बैक डोर से मंत्री बने... वित्त मंत्री के रूप में भयानक फैसले लेते रहे...

प्रोविडेंट फण्ड में, 
कभी उम्र की सीमा 
कभी ब्याज दर में छेड़छाड़

नेशनल पेंशन स्कीम में 
इतना दिमाग और रिस्ट्रिक्शन 
कि उसको डूबा ही समझिए
ये नही की पहले स्टॉक एक्सचेंज में,
बिभाग अनियमितता को दुरुस्त करें

नोटबन्दी में 
आम आदमी, गरीब, माध्यम वर्ग, 
व्यापारी, दुकानदार,  
वकील, डॉक्टर, प्राइवेट प्रैक्टिशनर
सबको पसीना पसीना 
तबाह कर दिए

जी एस टी में 
गाहक दुकानदार दोनो तबाह
कही से भी दाम में राहत नही
फल, फूल, सब्जी, 
चश्मा, रेस्टोरेंट, वस्त्र, उपकरण
सब जगह सबकुछ महंगा
जाहिर है मांग और खपत कम हो गयी
कुछ कंगाल हो गए
कुछ मितव्ययी
कहते हैं रिसेशन है
छुपाते है  कि रीज़न उनके 'रिफॉर्म्स' हैं
कुछ खरीदना गुनाह
व्यासाय व्यापार करना अपराध

प्राइवेसी में
नाक अड़ा दिए
सब चीज़ में आधार नंबर चाहिए
डेटा सुरक्षा का अता पता नही
पब्लिक का डेटा 
कोई भी हैकर निकाल सकता है।

डिजिटल करेंसी में
इतना जोर, 
ये नही कि पहले
पहले इंफ्रास्ट्रक्चर बनाये
सिक्योर करे
एंड्राइड फ़ोन से मैलवेयर से
भगवान भरोसे रक्षा है।

टैक्स लिमिट में 
राहत को दबा के रखे हैं 
2019 के लिए
नौकरी करना गुनाह हो गया।

पेट्रोलियम का राहत दबा के रखे है
ये नही कि जनता को राहत दे।

कहते हैं
70 साल में कुछ नही हुवा
70 साल का अव्यवस्था है।
क्या कर रहे थे ये इतना दिन?
70 साल जनता सरकार चुनती रही
कोई तानाशाह नही हुआ।
भारत प्रगतिशील रहा, 
पड़ोसी की तरह फेल्ड मुल्क नही बना।
घर घर मे मोबाइल, आई टी में उन्नति
एच ए एल, इसरो सब हुआ।
अभिव्यक्ति की आज़ादी रही
सद्भाव और प्रेम बना रहा।
फिर भी त्रुटि तो रही ही
इसलिए इस सरकार को जनादेश मिला।
इस जनादेश का सम्मान कीजिये।
पहले के 70 साल के जनादेश का भी सम्मान कीजिये।
चुनाव नही लड़े पहले वो?
2014 में  पैदा हुवे?
और अब क्या कर रहे हैं?
जनता एम पी नही चुना
तो बस लग गए पीछे?
70 साल का बहाना सुन सुन
पब्लिक का कान पक गया।
कितना  बहाना कीजियेगा और कब तक?

देश मे वही एक बुधियार समझदार
बाकी सब बुरबक बेवकूफ?

लोगो में हाहाकार क्यों
सोशल मीडिया पर इनको फटकार क्यों?
कुछ तो वजह है।

फिर भी न तो 
ये पद से हटने वाले हैं
न ही सुधरने वाले।

माननीय वित्त मंत्रीजी
पोन ठेलवा का आधुनिक उदहारण हैं।

माननीय प्रधानमंत्रीजी आपके नाम पे कब तक
इनको झेलना पड़ेगा?

त्राहिमाम!

समझिये
नही तो 2019, 
2004 जैसे इंडिया शाइनिंग न हो जाये!

शब्द कोष
पोन ठेलवा - वो व्यक्ति जिसे ऊपर चढ़ाने या आगे बढ़ाने के लिये हमेशा पुश करना पड़ता है। 

निवेदन:
यदि इस कथा को उनके कानों तक पहुंचाना चाहते हैं तो लाइक एवं शेयर अवश्य करें Facebook, Whatsapp, Twitter...।

डिस्क्लेमर:
इनकम टैक्स, सी बी आईं 
इत्यादि संस्था को पीछे न लगाएं
क्योंकि इस कथा के
सारे पात्र काल्पनिक है
कहानी भी काल्पनिक है
और कथाकार भी
;) 
अमिताभ झा
http://amitabh-jha.blogspot.in

Friday, August 11, 2017

असहजता


असहजता

वर्षों विदेश में रहने के बाद वापस लौटा।
पाया काफी कुछ बदल गया था।

बैंगलोर जैसे आधुनिक शहर में,
हर आई टी पार्क में
नमाज़ की जगह की व्यस्था थोड़ा अटपटा लगा।

अधिकांशतः मुस्लिम मर्द दाढ़ी बढ़ाये हुए, औरतें पर्दे में।
कुछ लोग पठानी पोशाक में।

दोपहर में हजूम नमाज के लिए बढ़ता हुआ, आफिस टाइम में।

कुछ ज़ाकिर नायक के फैन भी।
वो ज़ाकिर नायक जो यूट्यूब पर
हमारे आस्था की धज्जी उड़ाते दिखता रहता है।

अपने आस्था का सम्मान हो,
पर हमारे आस्था का न अपमान हो,
मैंने बस यही चाहा।

खैर, आफिस में अजीब लगता था।

काफी दिन तक असहज महसूस करता रहा।

जन्म से ब्राह्मण, धर्म से हिन्दू हूँ।
फिर भी प्रोफेशन और अध्यन में
धर्म को अलग रखा।
दोस्त बनाये, बिना धर्म पूछे।

हर धर्म के दोस्त हैं, आज भी।
सदा उनकी भावना का ख्याल रखता हूँ।

सलाम वालेकुम
वालेकुम अस्लाम
एल्हमदुल लिल्लाह
कहने में कभी असहजता नही हुई।
ये बचपन से देखा, बोला, सुना।

जो पहले नही देखा, न सुना, न अनुभव किया
वो देख असहज हो ही जाता हूं।

मांस के नाम पर हिंसा सुन भी असहजता होती है।

इंसान हूँ!

एक वक्त था,
जब इंज़माम उल हक को मैच से पहले
पूरी पाकिस्तान क्रिकेट टीम के साथ
मैदान में नमाज पढ़ता देख अजीब लगता था।
बोलता, अरे यार, मैच खेल, अच्छा खेल।
सजदा घर मे कर, मस्जिद में कर।

कभी सोचा नहीं था, ये सब इतनी करीब से देखना होगा।
अपने देश में, शहर में, आफिस में।
पर ये सच है।

आज के तनाव भरे जिंदगी में
सजदा, बल देती है।
मुझे भी तनाव होता है,
चंद मिनटों में,
बस आंख बंद कर
गहरी साँस लेते हुए
सजदा कर लेता हूँ।
नया बल मिल जाता है।

आफिस में, सजदे के लिए इतना प्रयत्न?
कार्यालय काल मे ये थोड़ा अटपटा लगता है।
बोलता नहीं हूँ, ये सोच कि लोग बुरा मान जाएंगे।

प्रोफेशनल जगह और कैरियर में
इस तरह की बाते पहले नही देखी थी।

अपने इस असहजता को कहा बताता?

मैं तो उप-राष्ट्रपति हूँ नही
न ही राजनीतिज्ञ।

चलो, ठीक है यार
सजदा ही है, गुनाह नहीं।

पर असहजता तो थी ही।

धीरे धीरे आदत हो गयी।

भारत बदल रहा है।

अब तो कोई मुस्लिम मित्र या कस्टमर आता है
तो मैं ही पूछ लेता हूँ, नमाज को जाएंगे क्या?
नमाजी मित्रों से मिलवा देता हूँ।

सब सुखी रहें, निरोग रहें,
मिल के रहें यही कामना करता हूँ

- अमिताभ