Sunday, September 26, 2010

बैजू और भोलू

आज मैं आपको कहानी सुनाऊंगा बैजू और भोलू की|

इससे पहले मैं ये स्पष्ट कर दूं कि कहानी के सारे पात्र काल्पनिक है|

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बैजू और भोलू
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एक समय की बात है, एक गांव था, हरा-भरा और खुशहाल| उस गांव में दो परिवार पास-पास रहते थे| दोनों परिवार में मधुर सम्बन्ध थे, आना-जाना था, खान-पीन था, सुख-दुःख का साथ था| परिवार के बुजुर्ग दादाजी लोग साथ गप्पे लड़ाते, शतरंज खेलते| दादियाँ सवेरे साथ-साथ पूजा के फूल तोड़ने जाती, शाम आरती के गीत साथ-साथ गातीं| पिता साथ खेत में काम करने जाते, माँ साथ मंदिर जातीं|

संयोग या विडम्बना कहिये, दोनों परिवार अगले पीढ़ी के संतान का इन्तजार बरसों से कर रहे थे| वे मन्नते मांगते, फरियाद करते, पर पूरी न होती| आखिरकार चौदह साल कांवर लेकर, वैद्यनाथ बाबा के दर्शन के बाद दोनों परिवार की मन्नत पूरी हो ही गयी| बाबा की कृपा से दोनों परिवार को पुत्र-रत्न की प्राप्ति हुयी| संयोग देखिये, एक ही दिन, एक ही घडी में| एक सेकंड का भी अंतर नहीं| परिवारों ने दोनों बच्चो का नाम बाबा के नाम पर रखा, वैद्यनाथ सिंह (बैजू) और भोलानाथ सिंह (भोलू)| एक बहुत ही प्रसिद्ध ज्योतिषराज से बच्चो की जन्मकुंडली बनवाई गयी जिन्होंने बताया की दोनों बच्चे जगत में बहुत नाम कमाएंगे|

बच्चे बड़े होने लगे| खाते-पीते घर से थे सो अच्छी परवरिश होती रही, प्रभु के कृपा से किसी चीज़ की कमी नहीं हुयी| समय बदला, जैसा कि पड़ोसियों में होता है, दोनों परिवार अपने बच्चे को अच्छा साबित करने में पीछे नहीं छूटते जिसका असर बच्चों पर भी होता गया | दोनों बच्चे साथ खेलते, कभी लड़ भी जाते| जब भी कोई खेल या प्रतियोगिता या इम्तिहान की बात होती, बैजू फटाक से भोलू को कहता, माँ का दूध पिया है तो आ जा मैदान में| दोनों अपनी जान लगा देते किन्तु जीत हमेशा बैजू सिंह की ही होती| ये सिलसिला उनके से बचपन से शुरू हुआ और चलता रहा| बैजू हमेशा जीतता रहा, अव्वल आता रहा| भोलू हमेशा दुसरे नंबर पे रहता और इसे ही अपनी नियति मान लेता| दोनों बड़े होते गए|

उसी समय महापराक्रमी दारा सिंह जी का उदय हुआ और दोनों बच्चे ने उनसे प्रभावित होके कुश्ती को अपना धर्म बना लिया| दोनों साथ लड़ते, अभ्यास करते| दोनों ने काफी प्रगति की| विद्यालय के स्तर से शुरुवात हुयी, फिर गांव, शहर, जिला, राज्य, और राष्ट्रीय स्तर पर जा पहुचे| किन्तु भोलू कभी बैजू से न जीत पाया| और एक दिन आया की दोनों का एशियन गेम्स के लिए चयन हो गया| दोनों फ़ाइनल में भी पहुच गए| बैजू ने वहा भी भोलू को माँ के दूध के हवाला दिया| दोनों जोड़ से लड़े| जैसा की होता आया था, जीत बैजू की ही हुयी| सौ कड़ोड़ की आबादी वाले देश के लिए गर्व की बात थी, स्वर्ण और रजत दोनों हासिल हुए| लोगों ने वापसी पे उनका पुरजोर स्वागत किया| सरकार, और निजी कंपनियों ने उन्हें इनामों से मालामाल कर दिया| दोनों मायानगरी में जुहू के पास एक आलीशान अपार्टमेन्ट में आमने सामने के घर में आ गए| अपार्टमेन्ट का माहौल मोहक, मादक और आकर्षक था, बोलीवुड के बहुत सारे अभिनेता, अभिनेत्री, नर्तक, नर्तकी, मॉडल इसकी चहल पहल को और बढ़ाते|

दो साल बाद ओलंपिक गेम्स हों वाले थे| बैजू ने घर में ही अखाडा और जिम बना लिया था| दिन रात मेहनत करता, शायद ही कभी अपार्टमेन्ट से बाहर निकलता| भोलू पड़ोस में एक आधुनिक जिम में जाता| वही उसकी मित्रता बॉलीवुड की उभरती हुयी अभिनेत्री से हो गयी| दोनों अक्सर जिम में मिलते, फिर धीरे धीरे बाहर भी मिलने लगे| एक दिन दोनों ने शादी कर ली और ख़ुशी ख़ुशी रहने लगे| कुछ दिन बाद भगवन ने उन्हें एक औलाद भी दे दी|

बैजू और भोलू दोनों ओलंपिक के लिए जी तोड़ मेहनत करते रहे और एक दिन आया की दोनों का चयन भी हो गया| ओलंपिक में दोनों ने बड़े-बड़े पहलवानों को चुनौती दी, धुल चटाया और, खूब लड़ा और सेमी फ़ाइनल तक पहुँच गए| बैजू दुसरे स्थान पर था और भोलू चौथे स्थान पर| सौ कड़ोड़ की आबादी वाले देश के लिए ख़ुशी का पल था और लोग स्वर्ण और रजत पदक की कल्पना से अभिभूत थे| सेमी फ़ाइनल में प्रतिद्वंद्वी उनसे भारी पड़े और कड़े मुकाबले में दोनों पराजित हो गए| देश के लिए गम का माहौल था तो संतोष भी की सौ कड़ोड़ की आबादी वाले देश के लिए कम से कम एक कांस्य पदक पक्की है| अब कांस्य पदक के लिए चिर प्रतिद्वंधियों को आपस में लड़ना था|

मैच शुरू होने को था, दोनों पहलवान रिंग में थे| बैजू ने शरारत से फिर भोलू की कान में कहा, माँ का दूध पिया है तो आ जा मैदान में| मैच शुरू हुआ, पहला राउण्ड, दूसरा, तीसरा, हर राउण्ड में भीषण मुकाबला होता रहा| बैजू चकित था, उसे भोलूसे कभी इतना प्रतिरोध नहीं मिला था| दूरदर्शन पर मैच देख रहे बैजू के परिवार वाले और प्रशंसक विस्मित थे तो भोलू के परिवार वाले और प्रशंसक अचंभित| और अब अंतिम राउण्ड आ चुका था| मैच शुरू हुआ, कड़ा मुकाबला, परम संघर्ष, पुरजोर प्रयास| दोनों एक दुसरे को पछाड़ने में कोई कसर नहीं छोड़ रहे थे, अंतिम कुछ पल बाकी थे, दोनों बेदम हो चुके थे और जमीन पर थे, उठ नहीं पा रहे थे , और अंतिम गिनती चल रही थी| फिर ये क्या हुआ? भोलू ने हिम्मत बटोर कर बैजू की तरफ मुंह किया, उस पर कूदा और उस को चित्त कर दिया| बैजू के परिवार वाले और प्रशंसक की आँखों में शोक के आंशु थे तो भोलू के परिवार वाले और प्रशंसक की आँखों में हर्ष के| ऐसा कभी हुआ न था, अनहोनी हुई, भोलू विजय हुआ|

बैजू टूट गया, शोक में डूबा रहा| पर बैजू मन का मजबूत था, मन में ठान लिया, अगले प्रतियोगता में देख लेगा| और दुनिया को भूल कर फिर से कड़ी मेहनत में लग गया| फिर कॉमन वेल्थ गेम्स हुए, भाग्य देखिये यहाँ भी बैजू भोलू से पराजित हो गया| अब ये सिलसिला चलता रहा, समय का पहिया घूमता रहा, वो कभी भोलू से जीत न पाया| एक समय आया दोनों रिटायर हो गए|

बैजू ने शादी कभी की नहीं, बिलकुल अकेला रहा, और हार का संताप| बैजू बीमार रहने लगा| एक दिन डॉक्टरों ने जवाब दे दिया| बैजू ने भोलू को बुलाया और उस से पूछा, आखिर क्या हुआ कि उस ओलंपिक मुकाबला के बाद वो कभी उस से जीत न पाया? भोलू मुस्कुराया और उसके कान में कुछ फुसफुसाया| बैजू चकित रह गया, उसकी आँखे खुली रह गयी और उस के कानों में भोला की आवाज गूंजने लगी "बैजू तुने सिर्फ माँ का दूध पिया| तुमने सिर्फ खेल पर ध्यान लगाया और अपनी दूसरी जरूरतों को कभी पूरा नहीं किया| जीवन में सफल होने के लिए व्यक्तिगत विकास, स्वास्थय, सम्बन्ध, मित्र, मनोरंजन इत्यादि भी अवश्यक हैं| जब जीवन में संघर्ष बढ़ता जाता है तो ये मनोबल बढ़ाने में, तनाव दूर करने में काम आते है|" पर अब पछताए होत क्या जब चिड़िया चुग गयी खेत| उसने वही प्राण त्याग दिए|

- अमिताभ रंजन झा

Sunday, September 5, 2010

नेक इमरान

Setting a highest example before communalists in the society, 19-year-old Imran sacrificed his life while saving two Hindu boys in Ranipur village of Siwan district at Ranipur in Bihar on September 1, 2010.

http://twocircles.net/2010sep05/19yrold_imran_sacrificed_his_life_save_two_hindu_boys.html

A poem dedicated to brave Imran.

ऐ दोस्त मुझे बता
कौन है महान,
ऊपर बैठा वो मालिक
या नेक इमरान?

उसने तो बचायी
दो मासूमो की जान,
क्यों उसको न बचा पाया
कहते जिसे हम रहमान?

अब जब भी आये
माह पाक रमजान,
याद करे ये क़ुरबानी
हर हिन्दू और मुसलमान|

- अमिताभ रंजन झा
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Thursday, August 26, 2010

माँ बिहार की करुण पुकार

वस्त्र जो तन पे ओढ़े हैं इन्होने
वो कोई नहीं है मच्छरदानी|
वो हैं इनके मैले चिथड़े कपड़े
जो कहते हैं इनकी कहानी||

भारत माँ की कभी ये थीं दुलारी
लोग कहते थे चीनी की कटोरी|
किस्मत ने ऐसी बदली मारी
भाग्यवान से हुयी यें दुखियारी||

बुद्ध, महावीर, अशोक जैसे माणिक्य
गुरु गोविन्द सिंह, आर्यभट, चाणक्य|
जन्मे बिहार ने अनगिनत संतान
जिनहो ने दुनिया में बढ़ाया मान||

जहाँ में उजाला इनके चिराग से
जल रही यें आज घर के ही आग से|
अपनों से ही लुटती रही अब
पीछे सबसे छुटती रही अब||

बरसों से यें है आस लगाये
चलो मिलके हम कदम बढ़ाये|
कब तक हो यें इनसे सहन
आओ करे अब इनपर रहम||

सुने माँ बिहार की करुण पुकार
आ मिल के करे इनका उद्धार|
वापस लाये इनका मान
तभी बढ़े हमारा सम्मान||

- अमिताभ रंजन झा

Wednesday, August 25, 2010

Happy Rakhi!

सुन ओ मेरी प्यारी बहन
राखी आज बंधवाऊंगा|
रक्षा का दू मै वचन
आजीवन निभाऊंगा||

यदि बहन नहीं है तो बना लो :)

क्या हुआ जो तू नहीं बहन
राखी आज बंधवाऊंगा|
रक्षा का दू मै वचन
आजीवन निभाऊंगा||

- अमिताभ रंजन झा

Saturday, August 14, 2010

जशन-ए-आज़ादी

जशन-ए-आज़ादी पे
है आज हसरत|
हो सख्त मेहनत
और मशक्कत||

गरीबी बदहाली को
दे जरा फुर्सत|
और अम्नोखुशहाली की
हो सदा बरकत||

ए मालिक कर इनायत,
बक्श हमें नेक किस्मत|
यार परिवार के संग मिल
तबियत से हो दावत||

नफरत और कड़वाहट हो
हमेशा के लिए रुखसत|
और वतन-ए-मोहब्बत में
शहादत की हो हिम्मत||

पड़ोसी के लिए थोड़ी
अक्ल की है चाहत|
दें दोस्ती का दस्तक,
प्यार की आहट||

काश वो बदले
अपनी बुरी फितरत|
और सियासत-ए-अमन की
करे इज्ज़त||

करे वो कसरत,
रखे लिहाज़-ए-इंसानियत|
छोड़े उसूल-ए-हुकूमत,
जो ढाए मासूमो पे क़यामत||

बंद करे वो उलटी-सीधी
हरकते निहायत|
वरना एक दिन लोग
करेंगे बगावत||

पर याद ये
बात रहे हजरत|
न हो कोई
गुस्ताख हिमाकत||

गर लड़ाई की
कभी हुई जुर्रत|
खाक होगी
बेशक तेरी किस्मत||

अमन पसंद हैं हम,
करे इसकी वकालत|
लड़ाई नहीं रही
कभी हमारी चाहत||

सबके लिए हो
पैगाम-ए-सदाकत|
जशन-ए-आज़ादी पे
है आज ये हसरत||

- अमिताभ रंजन झा

Friday, August 13, 2010

माँ मुझको कलेजे से लगाये रखना

नौ महीने उदर में
समाये रक्खा,
लहू से सींचा नाभी से
लगाये रक्खा,
अपनी धड़कन से दिल मेरा
जगाये रक्खा,
मीठे सपनो में मुझको
बसाये रक्खा|

इतना छोटा हूँ कि
हथेली में समा जाता,
अंगूठा चूसू बस और
कुछ भी नहीं आता,
छोड़ो हँसना अभी तो मैं
रो भी नहीं पाता,
माँ आँखे खोलू तो
जी मेरा घबराता|

तेरी गोदी में सीखूंगा
मैं खिलखिलाकर हँसना,
ऊँगली तेरी पकड़ कर
एक दिन है चलना,
माँ मुझ पे कभी भी
नाराज ना होना,
गिर भी जाऊ
तो सिखाना संभलना|

अपनी आँचल में मुझको
छुपाये रखना,
सर अपना मेरे माथे पे
टिकाये रखना,
दुनिया की निगाहों से
बचाए रखना,
माँ मुझको कलेजे से
लगाये रखना|

मेरे बालों में उंगलिया
फिराते रहना,
मेरे चेहरे को हाथों से
थपथपाते रहना,
मेरी आँखों पे चुम्बन
लुटाते रहना,
गालों से गालों को
सटाये रखना|

माँ मुझको आँचल में
छुपाये रखना|
माँ मुझको कलेजे से
लगाये रखना||

- अमिताभ रंजन झा

Poems dedicated to mother:

माँ तू याद आती है

आंतकवादी की माँ

हाड़ मांस का पुतला

Thursday, July 29, 2010

हबीब या रक़ीब

एक सुनसान से कब्रिस्तान में
किसी सुन्दर से पत्थर तले
खुबसूरत कफ़न में दफ़न
करता जाता है कोई परेशान इन्सान
एक एक जज्बात और नाकामयाबी को|

जिसे देख कर हैरान मैं नादान|

वो हबीब है या रक़ीब
मैं नहीं जनता पर ये हूँ मानता
कि ज़िंदा रहने और
आगे बढ़ने के लिए
ये क़दम जरुरी हैं यारों||

- अमिताभ रंजन झा

पागल मन

ख्वाबों में जो बसी हुयी हैं
नजरें उनको ढून्ढ रही हैं|
पागल मन कर रहा इशारे
शायद वो यही कही हैं||

कानो में पायल छनक रहे है
फिजाओं में महक वही है|
मौसम भी कर रहा इशारे
दिल में भी कसक वही है||

आँखों में छाए वो ही वो
सोने सी चमक रही हैं|
होठों पे मासूम हंसी है
असमान से उतर रही हैं||

पागल मन कर रहा इशारे
शायद वो यही कही हैं|

- अमिताभ रंजन झा

Saturday, July 24, 2010

हँसते हँसते कट जाए रस्ते

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मैंने पुछा क्या हाल
उसने कहा बस चल रहा|
मैंने पुछा किस रुट पर
सारे दांत मेरे गिरे टूट कर||

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विदेश आने से पहले
लोग सही बात नहीं बताते|
कुछ पता हो न हो
अफवाह जरुर फैलाते||

उधर आटा नहीं मिलेगा
ऐसा लोगो ने बताया|
तो मेरे एक साथी ने
दस किलो आटा ढो के लाया||

बीवी नहीं मिलेगी
ऐसा मुझे लोगो ने बताया|
सो मै पचहत्तर किलो
साथ ले के आया||
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- अमिताभ रंजन झा

Friday, July 23, 2010

भारतवर्ष की संतान


भारतवर्ष की संतान

भारतवर्ष की है संतान,
ये बात कभी तू भूले न|
ऐसे करना काम महान,
मन ख़ुशी से फूल समाये न||

एक मुख बस, आंख कान दो,
दस उंगलिया दिए विधाता ने|
बोल देख सुन थोड़ा, कर ज्यादा काम,
व्यर्थ समय कभी गंवाए न||

किसी हाल में कोई बुराई
तुझको कभी बहकाए न|
मुस्कान, स्वाभिमान तो रखना,
अभिमान कभी छू पाए न||

जीवनपथ में भेड़िये मिलेंगे,
सिर्फ मिलेंगे भेड़ ही न|
संयम से तू संग चले,
और कभी घबराये न||

अटल विश्वास से सब संभव,
असंभव तुझे झुकाए न|
साहस धीरज से रहना,
रोड़े कदम रोक पाए न||

तू जाये उस पथ भी,
जहा भय से कोई जाये न|
आगे बढ़ते जाना तू,
क्या हुआ संग कोई आये न||

जब तक न मंजिल हासिल हो,
न रुके तू और सोये न|
मुश्किल हो तो खूब लड़े,
न थके तू और रोये न||

एक मुकाम हो जब हासिल
आलस से सुस्ताये न|
कामयाबी पर जश्न हो बेशक
पर प्यास कभी बुझ पाए न||

सूरज, चाँद, सितारे भी
चमक तेरी घटाए न|
ब्रह्माण्ड सदा याद रखे,
इतिहास कभी भुलाये न||




- अमिताभ रंजन झा